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केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी संगठन पर बैन लगाया, 300 अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार…

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गुरुवार को केंद्र सरकार ने जमात-ए-इस्लामी संगठन को आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के उलट देश विरोधी गतिविधियों के चलते प्रतिबन्ध लगाया। इस बात को मद्देनजर रखते हुए इस संगठन को गैरकानूनी घोषित किया गया।

एक अधिसूचना में, गृह मंत्रालय ने कहा कि देश की एकता और अखंडता के विपरीत जमात-ए-इस्लामी संगठन देश विरोधी गतिविधियाँ और आतंकी संगठनों के लिए काम करता था। सरकार ने यह भी दावा किया कि जमात-ए-इस्लामी आतंकवादी संगठनों के साथ घनिष्ठ संपर्क में है और जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद और अलगाववाद को बढ़ावा और समर्थन देता है।

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सरकार ने कहा कि इस संगठन की गतिविधियों पर तुरंत अंकुश नहीं लगाया गया तो यह देश के खिलाफ विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दे सकता है, जिससे देश की एकता और अखंडता पर बहुत गहरा दुष्प्रभाव पड़ेगा।

पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमले में 40 जवानों की शहादत के बाद सुरक्षा बलों ने अलगाववादी ताकतों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। इस अभियान के तहत जमात-ए-इस्लामी के 300 नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।

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जमात-ए-इस्लामी संगठन पर तीसरी बार लगाया गया प्रतिबन्ध

जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर में सक्रिय एक सामाजिक व धार्मिक राजनीतिक संगठन है। यह 1942 में बनाया गया था, जिसकी विचारधारा जमात-ए-इस्लामी हिंद और जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान से काफी अलग है।

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1965 से 1987 तक, संगठन ने विधानसभा के साथ-साथ संसदीय चुनावों में भी भाग लिया। यह 1975 के इंदिरा-अब्दुल्ला समझौते के प्रमुख विरोधियों में से एक था, जिसे सरकार ने पहली बार प्रतिबंधित किया था। हालांकि, 1989 में उग्रवाद की शुरुआत के बाद से, संगठन सक्रिय रूप से अलगाववादी राजनीति के साथ जुड़ गया। जबकि इस संगठन को बड़े रूप से पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी समूह हिजबुल मुजाहिदीन का मूल राजनीतिक दल माना जाता था। जमात-ए-इस्लामी ने 1997 में आतंकवादी संगठन से खुद को सार्वजनिक रूप से दूर कर लिया था।

यह अपने इतिहास में तीसरी बार है कि जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया गया है। 1989 में उग्रवाद के बाद, संगठन को 1990 में गैरकानूनी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए फिर से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

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