कहानी उत्तराखंड के जवान की जिसने 72 घंटे में 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारा था

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जसवंत सिंह रावत 4 गढ़वाल राइफल्स, उत्तराखंड के पौड़ी जिले के बरयूं गांव के निवासी, जिन्होंने 1962 में भारत चीन के युद्ध में 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था.

राइफलमैन जसवंत सिंह के अदम्य साहस और शौर्य की कहानी जल्द ही बड़े पर्दे पर नजर आने वाली है. इनकी बायोपिक का नाम है “72 Hours – Martyr who never died”.
हाल ही में T-Series ने बायोपिक का देशभक्ति से ओतप्रोत गाना ‘वंदे मातरम’ रिलीज किया.


सोमवार (17 दिसंबर,2018) को T-Series ने फिल्म का टीज़र लॉन्च किया.

इस टिज़र का एक डायलॉग दिल को छूने वाला है – “हम लोग लौटे न लौटें, ये बक्से लौटे न लौटे लेकिन हमारी कहानियां जरूर लौटेंगी”

कहानी जसवंत सिंह रावत की

1962 का भारत चीन युद्ध. चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के लिए धावा बोल दिया था. 4 गढ़वाल राइफल को पीछे हटने का ऑर्डर दिया गया लेकिन जसवंत सिंह 10000 फीट की ऊंचाई पर मोर्चा संभाले रहे.

चीनी सेना को चकमा देने के लिए उन्होंने पोस्ट पर अलग-अलग जगह बंदूकों से फायरिंग करना शुरू कर दिया ताकि चीनी सेना को लगे की पोस्ट पर कई सैनिक तैनात हैं.
इसी दौरान जसवंत सिंह की सहायता सेला और नूरा नाम की दो स्थानीय लड़कियों ने की. उन्होंने जसवंत सिंह को खाना पानी पहुंचाया.

72 घंटे तक अकेले मोर्चा संभाले जसवंत सिंह ने चीनी सेना के लगभग 300 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था.

चीनी सेना ने जसवंत सिंह की मदद कर रही नूरा को पकड़ लिया और दूसरी लड़की सेला को ग्रेनेड हमले में उड़ा दिया.

गुस्से में भुनाये चीनी कमांडर को पता चला कि पोस्ट पर अकेला भारतीय सैनिक बचा है. यह बात पता चलते ही चीनी सेना ने पोस्ट पर दोनों तरफ से हमला बोल दिया.

जब जसवंत सिंह को लगा की चीनी उन्हें बंदी बनाकर ले जाएंगे तो अंत में खुद को गोली मारकर वह शहीद हो गए.

चीनी सर काट कर ले गए

चीनी सेना ने जसवंत सिंह का सर धड़ से अलग कर चीन ले गए. 20 अक्टूबर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा हुई.
चीनी कमांडर उनकी बहादुरी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जसवंत सिंह की प्रतिमा बनाकर भारतीय सेना को भेंट की. जो आज भी नूरानांग में उनके स्मारक में लगी है.

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मरने के बाद भी मिलते रहा प्रमोशन

मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित जसवंत सिंह भारतीय सेना के अकेले ऐसे सैनिक हैं जिन्हें मरने के बाद भी प्रमोशन मिलता रहा. आज वह मेजर जनरल के पद पर पहुंच चुके हैं.

जिस जगह पर उन्होंने चीनी सेना को धूल चटाई थी वहां उनकी याद में एक मंदिर भी बनाया गया.
जनरल हो या जवान उनके मंदिर के आगे बिना उन्हें श्रद्धांजलि दिए आगे नहीं बढ़ता.

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उत्तराखंड भी आते हैं छुट्टियों में

परिवार वालों को जब उनकी जरूरत होती है तो वे सेना में उनकी तरफ से छुट्टी की अर्जी देते हैं. छुट्टी मंजूर होने के बाद पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें पौड़ी जिले में स्थित उनके पुश्तैनी गांव बरयूं पहुंचाया जाता है और उनके छुट्टी खत्म होते ही ससम्मान वापस लाया जाता है.

आज भी चौबीसों घंटे भारतीय सेना के 5 जवान उनकी सेवा में नियुक्त रहते हैं. उनका बिस्तर लगाया जाता है, उनकी यूनिफॉर्म तैयार की जाती है और बकायदा उनके जूते पॉलिश किए जाते हैं.

जनवरी 2019 में रिलीज होगी बायोपिक

सोमवार (17 दिसम्बर) को 72 Hours – Martyr who never died का टिजर लॉन्च हुआ.
यह फिल्म 18 जनवरी 2019 को बड़े परदे पर रिलीज होगी.


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