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देवभूमी उत्तराखंड की एक ऐसी जगह जहां मुर्दे भी जिन्दा हो जाते हैं

उत्तराखंड राज्य को देवभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है

उत्तराखंड का आदिकालीन सभ्यताओं से हमेशा से गहरा नाता रहा है। राज्य में ऐसे अनेकों स्थान मौजूद हैं जहां ऐतिहासिक एवं पौराणिक काल के अवशेष बिखरे पड़े हैं।

लाखामंडल – ‘मृत्यु के मुंह से बचने का एक और मौका’

इन्हीं में से एक स्थल देहरादून से 128 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसे लाखामंडल नाम से जाना जाता है। यह गांव यमुना नदी के तट पर बर्नीगाड़ स्थान से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
लोक कथाओं के अनुसार द्वापर युग में दुर्योधन ने अपने भाई पांडवों और उनकी माता कुंती को जीवित ही जला देने के लिए यहां एक लाक्षागृह का निर्माण किया था। भले ही लाक्षागृह होने के यहां कोई सबूत नहीं मिलते हैं।

यमुना नदी के किनारे बसा लाखामंडल गांव देहरादून जिले के जौनसार बावर इलाके में पड़ता है। यह गांव ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों दृष्टि से बहुत ही विशेष महत्व रखता है.
माना जाता है कि कौरवों ने पांडवों और उनकी माता कुंती को जीवित ही जला देने के लिए इस स्थान पर लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण करवाया था, और जैसा कि विदित है कि पांडव उस लाक्षागृह से बच निकले थे, पांडव जिस गुफा से बचकर निकले थे वह ऐतिहासिक गुफा आज भी यहां मौजूद है।

यहां से बचने के बाद पांडवों ने एक माह ‘चक्र नगरी’ में बिताया, जिसे आज लोग चकराता नाम से जानते हैं। इस इलाके में खुदाई करने पर कई पौराणिक शिवलिंग और मूर्तियां मिली है जो इस बात की गवाह है कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा था।

हर शिवलिंग का अलग रंग

यहां पर पाए जाने वाले शिवलिंग की खासियत यह है कि यहां पर हर शिवलिंग का अलग अलग रंग है। शिवलिंग हजारों साल पुराने हैं लेकिन इन्हें कोई भी क्षति नहीं पहुंची है, बरसों तक जमीन के नीचे दबे रहने के कारण इन्हें कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा।

लाक्षेश्र्वर मंदिर

लाखामंडल में एक लाक्षेश्र्वर मंदिर है जो शिव भगवान को समर्पित है  और मंदिर लगभग 12 – 13वीं सदी में निर्मित नागर शैली का है, जिसके प्रांगण में एक शिवलिंग है। कहा जाता है इस शिवलिंग की स्थापना अज्ञातवास काल में पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने की थी।
परिसर में स्थित शिवलिंग ग्रेफाइट का बना हुआ है और जब भी इस पर जल चढ़ाया जाता है तो यह चमकने लगता है। इस दौरान इस शिवलिंग में व्यक्ति की छवि साफ नजर आती है। लोक मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि यह शिवलिंग लाखामंडल में सृष्टि के निर्माण काल से स्थापित है।

जहां मरा हुआ इंसान भी हो जाता है जिंदा

इस शिवलिंग के सामने ही दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं जो पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके खड़े हैं, जिनमें से एक द्वारपाल का हाथ कटा हुआ है। अब ऐसा क्यों है यह बात एक रहस्य ही बनी हुई है।ये दोनों द्वारपाल मानव और दानव के नाम से जाने जाते हैं।

जन्म और मृत्यु अटल सत्य है इन्हें सिक्के के दो पहलू कहा जाना भी गलत नहीं है। कहते हैं आत्मा जिस शरीर को एक बार छोड़ देती है उसमें पुनः प्रवेश नहीं करती और अपने लिए एक नए शरीर की तलाश करती है, शायद इसीलिए मृत्यु के बाद किसी भी व्यक्ति का वापस लौट कर आना संभव नहीं है, लेकिन इसके उलट लाखामंडल में कुछ अविश्वसनीय चीजें होती हैं।

यहां एक ऐसी मान्यता है कि अगर किसी भी मृत शरीर को इन द्वारपालों के सामने रखकर मंदिर का पुजारी उस पर पवित्र जल छिड़के तो वह मरा हुआ व्यक्ति कुछ समय के लिए पुनः जीवित हो जाता है। जीवित होते ही वह भगवान को याद करता है और उनका नाम लेता है और उसके बाद उसे पुजारी के हाथ से चावल, दूध और गंगाजल प्रदान किया जाता है। गंगा जल ग्रहण करते ही उसकी आत्मा फिर से शरीर त्याग कर चली जाती है। लेकिन इस बात का रहस्य क्या है, यह आज तक कोई नहीं जान पाया। लोक कथाओं के आधार पर लाखामंडल को इसीलिए एक और नाम से जाना जाता है, ‘मौड़ा’।

जालंधर की राजकुमारी ईश्वरा ने बनाया था मंदिर

लखेश्वर परिसर से एक छठी शताब्दी का शिलालेख मिला जिसमें उल्लेख है कि सिंहपुर के राज परिवार से संबंधित राजकुमारी ईश्वरा ने अपने मृत पति चंद्रगुप्त, जो कि जालंधर नरेश का पुत्र था, की सद्गति के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया।

चट्टान पर माता पार्वती के पैरों के निशान

इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रांगण में एक चट्टान पर पैरों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें यहां के स्थानीय लोग माता पार्वती के पैरों के निशान बताते हैं। मंदिर के अंदर भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय, भगवान विष्णु और हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित है।

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जेम्स बेली फ्रेजर, खोजकर्ता

लाखामंडल के पुरावशेषों को सबसे पहले जेम्स बेली फ्रेजर ने वर्ष 1814-15 में अपनी पुस्तक द हिमालय माउंटेंस में उजागर किया था।


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