हमारी बात

An Indian hand holds a printed photograph of a traditional Uttarakhand village in sharp focus, while India Gate and the surrounding city life appear softly blurred in the background.

शहर और गांव: एक जगह मौके ज्यादा हैं, दूसरी जगह लोग अपने लगते हैं

बेहतर जिंदगी केवल इस बात से तय नहीं होती कि आप शहर में रहते हैं या गांव में। असली सवाल यह है कि सुविधाएं, रोजगार, समय और अपनापन – इन चारों के बीच संतुलन कहां बन पाता है। यही सवाल इस लेख के केंद्र में है।

A comparison image showing Dharali village during the 2025 debris flow disaster and the same area one year later, highlighting changes in the landscape and reconstruction efforts.

5 अगस्त 2025 की धराली आपदा: एक साल बाद भी सामान्य नहीं हुई जिंदगी

“धराली में अब नई सड़क है। कुछ दुकानें फिर खुल चुकी हैं। लेकिन बाज़ार में चलते हुए यह समझने में देर नहीं लगती कि निर्माण और पुनर्निर्माण एक ही बात नहीं हैं। सड़क बन सकती है, इमारतें भी दोबारा खड़ी हो सकती हैं, लेकिन जिन परिवारों का घर और रोज़गार एक साथ गया, उनके लिए लौटना कहीं लंबी प्रक्रिया है।”

Representative image of an Indian mother preparing breakfast in the kitchen early in the morning before the family wakes up.

सुबह सूरज से नहीं, मां से शुरू होती है

मां का प्यार अक्सर बड़े शब्दों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखाई देता है। यह लेख उसी अनकहे स्नेह, त्याग और उस खालीपन की कहानी है, जिसे केवल वही समझ सकता है जिसने मां का साथ महसूस किया हो। आगे पढ़िए…

A Himalayan landscape in Uttarakhand showing a dense forest alongside road construction and hillside development, illustrating the balance between nature and infrastructure.

जंगलों के बिना कैसा कल?

जंगलों की असली कीमत लकड़ी से नहीं, बल्कि उन अनदेखे रिश्तों से तय होती है जो पानी, मिट्टी, वन्यजीव और इंसानी जीवन को जोड़ते हैं। इस लेख के माध्यम से समझिए कि जंगलों का सवाल आखिर भविष्य का सवाल क्यों बनता जा रहा है।

A lone bird flies above an old house and surrounding urban neighbourhood, highlighting the contrast between traditional nesting spaces and expanding city development.

जब पक्षी शहर छोड़ देते हैं

किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और सड़कों से नहीं होती, बल्कि उन जीवों से भी होती है जो बिना किसी मजबूरी के वहाँ रहना चुनते हैं। जब पक्षी किसी जगह को छोड़ने लगते हैं, तो यह बदलते पर्यावरण और जीवन-चक्र का एक मौन संकेत बन जाता है। आखिर यह बदलाव क्यों हो रहा है और हमें इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? समझिए…

A night view of an illuminated valley in Uttarakhand where city lights outshine the natural night sky, leaving only a few stars visible.

क्या शहरों ने रात छीन ली है?

शहरों की बढ़ती कृत्रिम रोशनी ने रात को पहले से कहीं अधिक सुरक्षित तो बनाया है, लेकिन इसी बदलाव ने तारों भरे आकाश, प्राकृतिक अंधकार और अनेक जीवों के जीवनचक्र पर गहरा असर भी डाला है। प्रकाश प्रदूषण हमारे पर्यावरण, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के अनुभव को किस तरह बदल रहा है, इस लेख के माध्यम से समझिए।

A woman preparing food in a home kitchen while other family members continue their morning routine in the background.

खाना बनाती स्त्रियाँ : हर थाली के पीछे का अनदेखा श्रम

कुछ चीज़ें इतनी नियमित, इतनी स्वाभाविक और इतनी रोज़मर्रा की हो जाती हैं कि एक समय बाद वे दिखाई देना बंद हो जाती हैं। शायद इसलिए हम उनका महत्व तब समझते हैं, जब किसी दिन ठहरकर उन्हें नए सिरे से देखने का अवसर मिलता है। यह लेख ऐसे ही एक अनुभव, एक कविता और हमारे घरों की उस अनकही दुनिया तक ले जाता है, जो हर दिन हमारे सामने होती है, लेकिन अक्सर दिखाई नहीं देती।

A man sitting quietly by a window in his home, reflecting on the emotional responsibilities of being a father, husband, son and brother.

एक बाप, एक पति, एक बेटा और एक भाई

घर के कई रिश्तों के बीच एक पुरुष अक्सर सबकी बातें सुनता है, लेकिन अपनी बात पूरी तरह कह नहीं पाता। जिम्मेदारियों, उम्मीदों और रिश्तों के इस संतुलन में उसकी चुप्पी कैसे बनती है उसकी सबसे बड़ी आवाज़, समझिए इस लेख में।

पुराना बटुआ और लोहे की चाबी के साथ पहाड़ में स्थित पैतृक घर

“एक उम्र बाद मैं वापस लौट आऊँगा”: एक पहाड़ी मन की कहानी

मेरे बटुए में आज भी एक पुरानी चाबी रखी है।

शायद वह अब किसी ताले में फिट भी न बैठे, लेकिन मेरे लिए वह घर लौटने का वादा है।

शहर में रहते हुए आदमी बहुत कुछ बदल देता है–रहने की जगह, बोलने का तरीका, खाने का समय, सोने की आदतें और कई बार अपने सपनों की शक्ल भी। लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलतीं। जैसे मन के किसी कोने में रखा अपना गांव। जैसे बंद पड़े घर का दरवाज़ा। जैसे वह रास्ता, जो सालों बाद भी याद रहता है।

सड़क किनारे नंदी की प्रतिमा के पास खड़ा एक कमजोर वास्तविक पशु, जबकि लोग प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

हम पत्थरों को नहीं, शायद अपनी कल्पनाओं को पूजते हैं

कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम वास्तविक चीज़ों से अधिक उनके प्रतीकों से जुड़ जाते हैं। शायद समस्या प्रतीकों में नहीं, बल्कि उस दूरी में है जो धीरे-धीरे उनके अर्थ और वास्तविक जीवन के बीच पैदा हो जाती है। और तब हम उन चीज़ों को बचाए रखते हैं जिन्हें देखा जा सकता है, जबकि उन भावनाओं को खो देते हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। इस लेख में इसी विरोधाभास पर एक चिंतन।