हमारी बात

पुराना बटुआ और लोहे की चाबी के साथ पहाड़ में स्थित पैतृक घर

“एक उम्र बाद मैं वापस लौट आऊँगा”: एक पहाड़ी मन की कहानी

मेरे बटुए में आज भी एक पुरानी चाबी रखी है।

शायद वह अब किसी ताले में फिट भी न बैठे, लेकिन मेरे लिए वह घर लौटने का वादा है।

शहर में रहते हुए आदमी बहुत कुछ बदल देता है–रहने की जगह, बोलने का तरीका, खाने का समय, सोने की आदतें और कई बार अपने सपनों की शक्ल भी। लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलतीं। जैसे मन के किसी कोने में रखा अपना गांव। जैसे बंद पड़े घर का दरवाज़ा। जैसे वह रास्ता, जो सालों बाद भी याद रहता है।

सड़क किनारे नंदी की प्रतिमा के पास खड़ा एक कमजोर वास्तविक पशु, जबकि लोग प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

हम पत्थरों को नहीं, शायद अपनी कल्पनाओं को पूजते हैं

कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम वास्तविक चीज़ों से अधिक उनके प्रतीकों से जुड़ जाते हैं। शायद समस्या प्रतीकों में नहीं, बल्कि उस दूरी में है जो धीरे-धीरे उनके अर्थ और वास्तविक जीवन के बीच पैदा हो जाती है। और तब हम उन चीज़ों को बचाए रखते हैं जिन्हें देखा जा सकता है, जबकि उन भावनाओं को खो देते हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। इस लेख में इसी विरोधाभास पर एक चिंतन।

पारंपरिक गढ़वाली गांव में चर्चा के दौरान अन्य लोगों की बात ध्यान से सुनता एक बुजुर्ग ग्रामीण।

जिस समाज में हर कोई बोल रहा है, वहाँ सुन कौन रहा है?

हम बातचीत नहीं करते, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। हम सुनते नहीं, उत्तर तैयार करते हैं। शायद हमारे समय की बहुत-सी समस्याएँ विचारों की कमी से नहीं, सुनने की कमी से पैदा हुई हैं। और जब सुनना कम होने लगता है, तो संवाद धीरे-धीरे प्रतिध्वनि में बदल जाता है। इस लेख में इसी प्रश्न पर एक विचार।

गढ़वाल के एक गांव में स्थित पारंपरिक पत्थर और मिट्टी का घर, जिसके बाहर रोजमर्रा की उपयोग की वस्तुएं दिखाई दे रही हैं।

पहाड़ छोड़ने वाले लोग पहाड़ को सबसे ज़्यादा क्यों याद करते हैं?

शहर में बस जाने के वर्षों बाद अचानक किसी बरसाती शाम में मिट्टी की गंध के साथ गाँव याद आ जाता है। किसी पहाड़ी शब्द, किसी त्योहार या किसी पुराने रास्ते की स्मृति मन को वहीं ले जाती है जहाँ से जीवन की शुरुआत हुई थी। शायद हम हमेशा जगहों को नहीं, अपने भीतर छूटे हुए हिस्सों को याद करते हैं। इस लेख में इसी अनुभव पर एक विचार।

देहरादून की सड़क पर चलती सिटी बस और आसपास दिखाई देता पुराना शहरी माहौल।

देहरादून : एक शहर, जो यादों में अब भी पुराना है

कभी नकरौंदा के आसपास गन्ने के खेत थे, सिटी बसें कम थीं और सोंग नदी गर्मियों की छुट्टियों का सबसे पसंदीदा ठिकाना हुआ करती थी। लगभग दो दशकों में देहरादून बहुत बदल गया, लेकिन कुछ यादें आज भी वहीं खड़ी हैं जहां उन्हें छोड़ा था। इस लेख में उसी पुराने देहरादून का एक स्मृति-सफर।

पर्यटन, सेना और तकनीक आधारित आजीविका से जुड़े पहाड़ी युवाओं का प्रतिनिधिक दृश्य

पहाड़ का भविष्य: पर्यटन, सेना या टेक्नोलॉजी?

रोजगार की तलाश में पहाड़ का युवा लंबे समय तक कुछ तय रास्तों तक सीमित रहा, लेकिन बदलते समय के साथ नए विकल्प भी सामने आ रहे हैं। इस लेख के माध्यम से उस बड़े सवाल को समझने की कोशिश की गई है कि आने वाले वर्षों में पहाड़ की अर्थव्यवस्था और युवाओं की दिशा किस संतुलन पर टिक सकती है।

पहाड़ी गाँव की राशन दुकान में उधार की कॉपी देखते दुकानदार और हिसाब चुकता करते बुजुर्ग ग्रामीण का दृश्य

राशन की दुकान और उधार की कॉपी

एक पहाड़ी गाँव की वह छोटी-सी दुकान, जहाँ जरूरत के समय हिसाब से पहले भरोसा लिखा जाता था। वहाँ उधार केवल लेन-देन नहीं था, बल्कि सामाजिक संबंधों और आपसी उत्तरदायित्व की एक मौन परंपरा थी।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बीच अवसर और दबाव के बीच खड़ा उत्तराखंड का युवा दर्शाता दृश्य

पहाड़ का युवा और प्रतियोगी परीक्षाएँ : अवसर की डगर या दबाव का बोझ?

पहाड़ का युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में समय, ऊर्जा और उम्मीद लगाता है। यह मार्ग कई बार अवसर का द्वार बनता है, तो कई बार अनिश्चितता और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव भी साथ लाता है।