
पहाड़ की आवाज़, परदे की कहानी: गढ़वाली फिल्म इंडस्ट्री

पहाड़ की ‘मशरूम लेडी’: दिव्या रावत ने मशरूम खेती से खोले रोजगार के नए रास्ते, पलायन रोकने की पहल
चमोली की दिव्या रावत ने मशरूम खेती के माध्यम से हजारों परिवारों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए और पहाड़ों में पलायन की समस्या के समाधान की दिशा में एक नई पहल की।

पहाड़ की ‘नमकवाली’: ₹1,000 से शुरू हुआ सफर बना ₹5 करोड़ का कारोबार, शशि बहुगुणा रतूड़ी की प्रेरक कहानी
उत्तराखंड की उद्यमी शशि बहुगुणा रतूड़ी ने ₹1,000 से शुरू हुए पारंपरिक “पिस्यू लून” के छोटे व्यवसाय को आज करोड़ों के ब्रांड “नमकवाली” में बदल दिया है।

पहाड़ का “ट्री मैन”: चंदन नयाल ने 12 वर्षों में लगाए 80,000 से अधिक पेड़, जंगल और जल संरक्षण की अनोखी मिसाल
नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र के चंदन नयाल ने पिछले 12 वर्षों में 80,000 से अधिक पेड़ लगाकर और हजारों चाल-खाल बनाकर पहाड़ों में जल और जंगल संरक्षण की अनोखी मिसाल पेश की है।

बंजर ज़मीन से हरियाली तक: उत्तराखंड के 60 वर्षीय किसान ने लगाए एक लाख पेड़, बदल दी पूरे गांव की तस्वीर
बागेश्वर जिले के सिरकोट गांव के किसान जगदीश चंद्र कुणियाल ने चार दशकों में लगभग एक लाख पेड़ लगाकर बंजर जमीन को घने जंगल में बदल दिया और पूरे गांव की सोच बदल दी।

भारत का एक ऐसा मंदिर जहाँ चिट्ठी लिखकर माँगा जाता है न्याय
कुमाऊँ क्षेत्र में गोल्ज्यू देवता के मंदिरों में लोग चिट्ठी लिखकर न्याय की गुहार लगाते हैं। जानिए इस परंपरा, घोड़ाखाल मंदिर और लोककथाओं से जुड़ी मान्यताएँ।

पहाड़ का भविष्य : पर्यटन, सेना या टेक्नोलॉजी?
प्रश्न यह नहीं कि इन तीनों में से कौन बेहतर है। प्रश्न यह है कि पहाड़ का भविष्य किस दिशा में संतुलित और स्थायी रह सकता है।

राशन की दुकान और उधार की कॉपी
एक पहाड़ी गाँव की वह छोटी-सी दुकान, जहाँ जरूरत के समय हिसाब से पहले भरोसा लिखा जाता था। वहाँ उधार केवल लेन-देन नहीं था, बल्कि सामाजिक संबंधों और आपसी उत्तरदायित्व की एक मौन परंपरा थी।

पहाड़ का युवा और प्रतियोगी परीक्षाएँ : अवसर की डगर या दबाव का बोझ?
पहाड़ का युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में समय, ऊर्जा और उम्मीद लगाता है। यह मार्ग कई बार अवसर का द्वार बनता है, तो कई बार अनिश्चितता और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव भी साथ लाता है।

मैं, पहाड़ का चूल्हा
मैं मिट्टी से बना था।
न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ।
मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की महक थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था।
मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा।

जलते जंगलों के बीच खड़ा पहाड़, क्या धुएँ में घुल रही है हमारी पहाड़ी पहचान
जलते जंगलों के बीच खड़ा पहाड़ और धुएँ में घुलती पहाड़ी पहचान उत्तराखंड में वनाग्नि के बढ़ते संकट की ओर संकेत करती है। जानिए इसके कारण, प्रभाव और समाधान।

नंदा देवी शिखर पर चढ़ाई क्यों प्रतिबंधित है?
नंदा देवी भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है, लेकिन इसके मुख्य शिखर पर पर्वतारोहण प्रतिबंधित है। इसके पीछे पर्यावरण संरक्षण, ऐतिहासिक घटनाएँ और हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी जैसे कई कारण जुड़े हुए हैं।

द्रोणागिरी पर्वत का रहस्य: उत्तराखंड का वह गाँव जहाँ हनुमान से जुड़ी एक अनोखी लोकमान्यता सुनाई देती है
चमोली जिले के द्रोणागिरी पर्वत से जुड़ी एक अनोखी लोकमान्यता आज भी स्थानीय लोगों के बीच सुनाई देती है। यह कथा रामायण की संजीवनी बूटी की कहानी से जुड़ी मानी जाती है।

रूपकुंड: हिमालय की वह रहस्यमयी झील जहाँ मिले सैकड़ों मानव
चमोली जिले में स्थित रूपकुंड झील को “स्केलेटन लेक” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहाँ बर्फ पिघलने पर सैकड़ों मानव कंकाल दिखाई देते हैं। यह रहस्य आज भी वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को आकर्षित करता है।

चोपता : खूबसूरत गुलाबी बुराँश का अद्भुत संसार
वसंत में जब चोपता के ढलानों पर बुराँश खिलता है, तो वह केवल जंगल को रंग नहीं देता;
वह उस हिमालयी संतुलन को उजागर करता है जिस पर यह पूरा पारिस्थितिक तंत्र टिका है।

पहाड़ों में रोजगार के नए अवसर
उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पर्यटन, जैविक खेती और छोटे स्थानीय उद्यमों के माध्यम से रोजगार के नए अवसर उभर रहे हैं। जानिए कैसे बदलता दृष्टिकोण, होमस्टे, पारंपरिक अनाज और डिजिटल काम पहाड़ के युवाओं के लिए नई संभावनाएँ खोल रहे हैं।

90 के दशक का देहरादून: एक शांत शहर और अपनेपन से भरी ज़िंदगी
90 के दशक का देहरादून एक शांत, धीमी रफ्तार और अपनापन भरा शहर था। उस दौर की गलियाँ, मोहल्ले और रिश्ते आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं।

सीढ़ीदार खेत : आख़िर इतनी खड़ी जगहों पर ये खेत किसने बनाए? कैसे बनाए?
मध्य हिमालय की ढलानों पर उकेरी गई ये सीढ़ियाँ केवल खेत नहीं हैं। वे उस सामूहिक श्रम और भूगोल की समझ का परिणाम हैं, जिसने खड़ी पहाड़ियों को जीवन-योग्य कृषि भूमि में बदला।

मानसून में पहाड़: यात्रा, जोखिम और वास्तविकता
मानसून में पहाड़ सिर्फ हरे नहीं होते, अस्थिर भी होते हैं। यात्रा का रोमांच जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक अदृश्य जोखिम ढलानों, नदियों और रास्तों के भीतर सक्रिय रहता है।







