
न बिजली, न मशीन-फिर भी सालों तक चलती रही ये जल-चलित चक्की
उत्तराखंड के पहाड़ों में घराट (घट्ट) कैसे बहते पानी की शक्ति से अनाज पीसने का पारंपरिक और आत्मनिर्भर साधन बना, जानिए इसकी कार्यप्रणाली और महत्व।

उत्तराखंड के पहाड़ों में घराट (घट्ट) कैसे बहते पानी की शक्ति से अनाज पीसने का पारंपरिक और आत्मनिर्भर साधन बना, जानिए इसकी कार्यप्रणाली और महत्व।

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पर्यटन, जैविक खेती और छोटे स्थानीय उद्यमों के माध्यम से रोजगार के नए अवसर उभर रहे हैं। जानिए कैसे बदलता दृष्टिकोण, होमस्टे, पारंपरिक अनाज और डिजिटल काम पहाड़ के युवाओं के लिए नई संभावनाएँ खोल रहे हैं।

90 के दशक का देहरादून एक शांत, धीमी रफ्तार और अपनापन भरा शहर था। उस दौर की गलियाँ, मोहल्ले और रिश्ते आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं।

मध्य हिमालय की ढलानों पर उकेरी गई ये सीढ़ियाँ केवल खेत नहीं हैं। वे उस सामूहिक श्रम और भूगोल की समझ का परिणाम हैं, जिसने खड़ी पहाड़ियों को जीवन-योग्य कृषि भूमि में बदला।

मानसून में पहाड़ सिर्फ हरे नहीं होते, अस्थिर भी होते हैं। यात्रा का रोमांच जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक अदृश्य जोखिम ढलानों, नदियों और रास्तों के भीतर सक्रिय रहता है।

भालू हमले अब पहाड़ में अपवाद नहीं रहे। बदलते जंगल, बिखरते आवास और आसान भोजन की आदत ने मानव-वन्यजीव टकराव को नई तीव्रता दी है। यदि सामना हो जाए, तो समझ और संयम ही पहली सुरक्षा है।

मैं मिट्टी से बना था।
न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ।
मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की महक थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था।
मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा।