84 दिनों की भूख हड़ताल, टिहरी के जनआंदोलन को नई दिशा देने वाला बलिदान

टिहरी गढ़वाल के जनआंदोलन में श्री देव सुमन की 84 दिनों की भूख हड़ताल ने कैसे जनचेतना को नई दिशा दी और उनके बलिदान का क्या प्रभाव पड़ा।
श्री देव सुमन का चित्र, टिहरी रियासत के खिलाफ आंदोलन के संदर्भ में

उत्तराखंड के आधुनिक इतिहास में श्री देव सुमन का नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्मरण किया जाता है, जिसने पर्वतीय समाज में जनअधिकारों और राजनीतिक जागरूकता की भावना को स्वर दिया। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कथा नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें रियासती शासन के अंतर्गत रहने वाली जनता धीरे-धीरे अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रही थी।

श्री देव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को टिहरी गढ़वाल ज़िले के जौल गाँव में हुआ। उनका मूल नाम श्रीदत्त बडोनी था। बाद में उन्होंने सार्वजनिक जीवन और साहित्यिक गतिविधियों के दौरान “श्री देव सुमन” नाम अपनाया, जो आगे चलकर उनके आंदोलनकारी व्यक्तित्व की पहचान बन गया। पहाड़ के साधारण सामाजिक परिवेश में पले-बढ़े सुमन प्रारम्भ से ही संवेदनशील और जिज्ञासु स्वभाव के थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उनकी प्रारम्भिक शिक्षा टिहरी क्षेत्र में हुई और आगे चलकर देहरादून तथा बनारस जैसे शैक्षिक केंद्रों से भी उनका संपर्क रहा। इसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों और हिंदी साहित्यिक धारा से प्रभावित हुए।

सुमन केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि लेखन और वैचारिक अभिव्यक्ति के माध्यम से भी सक्रिय थे। उन्होंने टिहरी रियासत की प्रशासनिक नीतियों और जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया। उस समय टिहरी गढ़वाल एक स्वतंत्र रियासत थी, जहाँ शासन व्यवस्था मुख्यतः राजसत्ता के नियंत्रण में थी और जनता के नागरिक अधिकार सीमित माने जाते थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा राजनीतिक संगठन की गतिविधियों पर नियंत्रण की स्थितियाँ धीरे-धीरे असंतोष का कारण बनने लगी थीं।

इन्हीं परिस्थितियों में टिहरी राज्य प्रजा मंडल जैसे संगठनों का गठन हुआ, जिनका उद्देश्य जनता के अधिकारों की माँग और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की स्थापना था। श्री देव सुमन इस आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और शांतिपूर्ण विरोध तथा जनजागरण के प्रयासों में भाग लेने लगे। उनकी गतिविधियों को रियासती शासन ने चुनौती के रूप में देखा और उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। वर्ष 1943 में उनकी एक महत्वपूर्ण गिरफ्तारी हुई, जिसके बाद उनका संघर्ष एक निर्णायक चरण में प्रवेश करता है।

कारावास के दौरान उन्होंने विरोध के प्रतीक के रूप में भूख हड़ताल का मार्ग चुना। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यह उपवास लगभग 84 दिनों तक चला, जो उस समय के राजनीतिक आंदोलनों के संदर्भ में अत्यंत उल्लेखनीय माना जाता है। लगातार उपवास के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर होती गई और अंततः 25 जुलाई 1944 को टिहरी कारागार में ही उनका निधन हो गया। कुछ स्थानीय विवरणों और द्वितीयक स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उनके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार को लेकर परिस्थितियाँ विवादास्पद रहीं, यद्यपि इस विषय में विभिन्न स्रोतों में भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं।

श्री देव सुमन का बलिदान टिहरी रियासत में चल रहे जनआंदोलन के लिए एक प्रेरक घटना सिद्ध हुआ। उनके निधन के पश्चात जनचेतना और अधिक व्यापक रूप में सामने आई तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की माँग को नई दिशा मिली। आगे चलकर वर्ष 1949 में टिहरी राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ, जिसे उस ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति के रूप में देखा जाता है जिसमें जनता की राजनीतिक आकांक्षाएँ और स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक पृष्ठभूमि दोनों सम्मिलित थीं।

आज श्री देव सुमन को उत्तराखंड में केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक साहस, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनअधिकारों की चेतना के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल प्रत्यक्ष संघर्ष से नहीं, बल्कि विचार, लेखन और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के माध्यम से भी संभव होता है। पहाड़ के जनजीवन में उनका नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है, क्योंकि वे उस प्रश्न का जीवित उत्तर प्रतीत होते हैं कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस किस प्रकार इतिहास की दिशा को प्रभावित कर सकता है।