श्री देव सुमन: टिहरी रियासत के खिलाफ वह आवाज़, जिसने 84 दिन तक भूख हड़ताल की

टिहरी गढ़वाल के श्री देव सुमन ने रियासत के खिलाफ संघर्ष करते हुए 84 दिन तक भूख हड़ताल की और 1944 में जेल में ही प्राण त्याग दिए। जानिए उनके आंदोलन और बलिदान की पूरी कहानी।
श्री देव सुमन का चित्र, टिहरी रियासत के खिलाफ आंदोलन के संदर्भ में

उत्तराखंड के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रतिरोध का प्रतीक बन जाते हैं।
श्री देव सुमन उन्हीं नामों में से एक हैं।

उनकी कहानी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की नहीं है,
बल्कि उस संघर्ष की है, जो पहाड़ के लोगों ने अपने अधिकारों के लिए लड़ा।

जन्म और पहाड़ की पृष्ठभूमि

श्री देव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को टिहरी गढ़वाल ज़िले के जौल गाँव में हुआ था।

पहाड़ के साधारण परिवेश में पले-बढ़े सुमन आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन के विचारों से प्रभावित हुए।
युवावस्था में ही उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी।

टिहरी रियासत का समय

उस समय टिहरी गढ़वाल एक स्वतंत्र रियासत थी, जहाँ शासन राजा के हाथ में था।

जनता के अधिकार सीमित थे
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण था
विरोध करने पर कार्रवाई की जाती थी

इन्हीं परिस्थितियों में टिहरी राज्य प्रजा मंडल जैसे संगठनों का गठन हुआ,
और श्री देव सुमन उससे सक्रिय रूप से जुड़े।

उनकी मांगें स्पष्ट थीं –
जनता को अधिकार मिले और शासन में जवाबदेही आए।

गिरफ्तारी और संघर्ष

श्री देव सुमन की गतिविधियों को देखते हुए रियासत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

जेल में रहते हुए उन्होंने विरोध के रूप में भूख हड़ताल शुरू की।
यह केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था, बल्कि एक लंबा और कठिन संघर्ष था।

उन्होंने लगातार 84 दिन तक भूख हड़ताल जारी रखी।

25 जुलाई 1944: एक निर्णायक दिन

लंबे समय तक भूख हड़ताल के कारण उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई।

अंततः 25 जुलाई 1944 को जेल में ही उनका निधन हो गया।

कुछ विवरणों में उल्लेख मिलता है कि उन्हें सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं दिया गया,
हालाँकि इस विषय पर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग जानकारी मिलती है।

उनके बलिदान का प्रभाव

श्री देव सुमन का संघर्ष एक व्यक्तिगत घटना नहीं रहा।

उनके बलिदान ने टिहरी रियासत के खिलाफ चल रहे आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
आने वाले वर्षों में जनआंदोलन मजबूत हुआ और अंततः टिहरी राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ।

क्यों महत्वपूर्ण है यह कहानी

श्री देव सुमन की कहानी हमें यह समझाती है कि संघर्ष केवल हथियारों से नहीं होता।

कभी-कभी सबसे बड़ा संघर्ष वह होता है,
जब एक व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर डटा रहता है – चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों।

अंत में

पहाड़ की शांत वादियों में आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

श्री देव सुमन केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं,
वे उस सवाल का उत्तर हैं
कि अन्याय के सामने खड़े होने का साहस क्या होता है।