उत्तराखंड के चमोली ज़िले में जोशीमठ के पास नीति घाटी की दिशा में एक छोटा-सा पहाड़ी गाँव है – द्रोणागिरी (दूनागिरी)।
यह गाँव हिमालय की ऊँची चोटियों के बीच स्थित है और इसके ऊपर दिखाई देने वाला द्रोणागिरी पर्वत इस पूरे क्षेत्र की पहचान माना जाता है।
द्रोणागिरी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है।
यह स्थान रामायण से जुड़ी लोककथाओं, स्थानीय मान्यताओं और हिमालयी संस्कृति के कारण भी विशेष महत्व रखता है।
इसी कारण द्रोणागिरी का नाम अक्सर संजीवनी बूटी की कथा के साथ जोड़ा जाता है।
रामायण से जुड़ी प्रसिद्ध कथा
रामायण के अनुसार लंका युद्ध के दौरान लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
उन्हें बचाने के लिए वैद्य सुषेण ने हिमालय से संजीवनी बूटी लाने की सलाह दी।
तब हनुमान को उस औषधि की खोज में हिमालय भेजा गया।
लोककथा के अनुसार जब हनुमान पर्वत पर पहुँचे तो उन्हें सही जड़ी-बूटी पहचानने में कठिनाई हुई।
तब उन्होंने पूरा पर्वत ही उठाकर लंका की ओर उड़ान भर ली।
भारतीय परंपराओं में कई स्थान इस कथा से जुड़े माने जाते हैं, जिनमें उत्तराखंड का द्रोणागिरी पर्वत भी प्रमुख रूप से उल्लेखित किया जाता है।
द्रोणागिरी गाँव की अनोखी लोकमान्यता
द्रोणागिरी पर्वत के नीचे स्थित द्रोणागिरी गाँव की अपनी एक अलग लोककथा भी प्रचलित है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार जब हनुमान संजीवनी लेने के लिए पर्वत का एक हिस्सा लेकर गए, तो इससे पर्वत को क्षति पहुँची।
इसी कारण गाँव के कुछ लोगों में यह विश्वास रहा कि हनुमान ने उनके पर्वत का भाग ले लिया।
लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि इसी कारण लंबे समय तक गाँव के कुछ परिवारों में हनुमान पूजा नहीं की जाती थी।
हालाँकि यह कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है।
इसे स्थानीय लोकविश्वास और परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।
औषधीय पौधों के लिए प्रसिद्ध क्षेत्र
द्रोणागिरी पर्वत का क्षेत्र हिमालय की समृद्ध जैव विविधता के लिए भी जाना जाता है।
यहाँ कई दुर्लभ औषधीय पौधे पाए जाते हैं, जैसे:
- जटामांसी
- कुटकी
- अतीस
- अन्य हिमालयी जड़ी-बूटियाँ
इसी कारण कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि संजीवनी की कथा का संबंध संभवतः हिमालय के ऐसे ही औषधीय क्षेत्रों से जुड़ा हो सकता है।
हालाँकि “संजीवनी बूटी” की सटीक पहचान आज तक स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं हो पाई है।
हिमालयी संस्कृति और लोककथा
द्रोणागिरी पर्वत की कहानी केवल धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है।
यह हिमालय के उस सांस्कृतिक संसार को भी दिखाती है जहाँ प्रकृति, लोकविश्वास और इतिहास एक साथ दिखाई देते हैं।
गढ़वाल क्षेत्र में ऐसी अनेक कहानियाँ पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं, जो स्थानीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी हैं।
अंत में
हिमालय में कई स्थान ऐसे हैं जहाँ मिथक, प्रकृति और लोकविश्वास एक साथ दिखाई देते हैं।
द्रोणागिरी पर्वत भी उन्हीं स्थानों में से एक है।
यह केवल एक पर्वत नहीं है, बल्कि उस कथा का प्रतीक है जिसने सदियों से लोगों की कल्पना और आस्था दोनों को प्रभावित किया है।
और शायद इसी कारण आज भी जब द्रोणागिरी का नाम लिया जाता है, तो लोगों को रामायण की वही कथा याद आती है –
जब हनुमान संजीवनी की खोज में हिमालय पहुँचे थे।




