उत्तराखंड के बागेश्वर ज़िले के शांत और पहाड़ी गांव सिरकोट में रहने वाले 60 वर्षीय किसान जगदीश चंद्र कुणियाल की कहानी पर्यावरण संरक्षण और मानवीय दृढ़ता का अद्भुत उदाहरण है। जिस ज़मीन को कभी लोग बंजर और बेकार मानते थे, आज वही इलाका घने पेड़ों से भर चुका है। पिछले चार दशकों में जगदीश कुणियाल ने अपनी मेहनत और संकल्प से लगभग एक लाख पेड़ लगाए और उस सूखी ज़मीन को एक हरे-भरे जंगल में बदल दिया।
यह कहानी सिर्फ पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि धैर्य, विश्वास और प्रकृति के प्रति समर्पण की कहानी है। उनकी मेहनत ने न केवल उनकी अपनी ज़मीन को पुनर्जीवित किया, बल्कि पूरे गांव में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की एक नई लहर पैदा कर दी।
जगदीश कुणियाल का जीवन आसान नहीं रहा। जब वे 18 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी। परिवार और खेती की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। इसी समय उन्होंने अपने पिता की छोड़ी हुई ज़मीन को संवारने और उसे कुछ सार्थक बनाने का संकल्प लिया।
वे बताते हैं कि लगभग 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने तय किया कि वे अपनी भूमि को बंजर नहीं रहने देंगे। खेती के साथ-साथ वे गांव में एक छोटा राशन की दुकान भी चलाते हैं, जिससे गांव के लोगों को आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं।
असफलताओं से मिली नई राह
1990 के आसपास उन्होंने अपने खेत में अमरूद और अखरोट के पेड़ लगाकर शुरुआत की। उन्हें उम्मीद थी कि फलदार पेड़ अच्छी पैदावार देंगे और आर्थिक सहारा भी बनेंगे। लेकिन शुरुआती प्रयास सफल नहीं रहे। पेड़ ठीक से नहीं बढ़ पाए और परिणाम निराशाजनक रहे।
लेकिन कुणियाल हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने अलग-अलग प्रजातियों के पेड़ लगाने का प्रयोग शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने शीशम, देवदार, बांज (ओक) और बुरांश (rhododendron) जैसे पेड़ लगाए। पहाड़ी जलवायु में ये प्रजातियाँ बेहतर तरीके से पनपने लगीं।
शुरुआती वर्षों में गांव के कई लोग उनके प्रयासों को संदेह की नज़र से देखते थे। लोग कहते थे कि पत्थरीली और सूखी ज़मीन में पेड़ नहीं उग सकते। लेकिन कुणियाल को विश्वास था कि अगर लगातार मेहनत की जाए तो ज़मीन की तस्वीर बदली जा सकती है।
कठिनाइयों से भरा सफर
उनका खेत घर से लगभग पांच किलोमीटर दूर था। हर दिन वे पैदल चलकर खेत तक पहुँचते और पौधों की देखभाल करते। कई बार अनियमित बारिश और मवेशियों द्वारा पौधों को नुकसान पहुँचाने से उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता।
इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने ज़मीन को गहराई तक खोदकर भूमिगत जल स्रोतों तक पहुँचने की कोशिश की, ताकि पौधों को पानी मिल सके। धीरे-धीरे पेड़ बड़े होने लगे और आसपास का जलस्तर भी बढ़ने लगा।
समय के साथ-साथ उस क्षेत्र में भूमिगत पानी फिर से सतह पर आने लगा। इससे गांव के लोगों को भी पानी मिलने लगा। तब जाकर लोगों को एहसास हुआ कि कुणियाल का प्रयास केवल खेती तक सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरे इलाके के पर्यावरण को बदल रहा था।
चाय की खेती से रोजगार
पेड़ों की सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। बाद में सरकार के सुझाव पर उन्होंने अपनी ज़मीन के एक हिस्से में चाय की खेती भी शुरू की। इससे न केवल भूमि का बेहतर उपयोग हुआ बल्कि गांव के लोगों के लिए रोजगार भी पैदा हुआ।
आज उनके साथ दो स्थानीय कर्मचारी पिछले लगभग 25 वर्षों से काम कर रहे हैं। वे चाय के पौधों और जंगल की देखभाल करते हैं। कुणियाल कहते हैं कि उनका उद्देश्य केवल अपनी ज़मीन को सुधारना नहीं था, बल्कि गांव के लोगों के लिए भी स्थायी आजीविका के अवसर बनाना था।
‘मन की बात’ में मिली राष्ट्रीय पहचान
साल 2021 में जगदीश कुणियाल के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” में उनके कार्यों का उल्लेख किया।
यह उनके लिए अप्रत्याशित सम्मान था। वे कहते हैं कि उन्होंने कभी किसी पहचान या पुरस्कार की उम्मीद नहीं की थी। वे केवल अपने मन की शांति और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण बनाने के उद्देश्य से काम कर रहे थे।
प्रधानमंत्री द्वारा सराहना के बाद उनके गांव में भी एक नई जागरूकता आई। कई लोगों ने अपने खेतों और घरों के आसपास पेड़ लगाना शुरू किया।
गांव में बदली सोच
आज सिरकोट गांव की तस्वीर बदल चुकी है। जहां कभी सूखी ज़मीन थी, वहां अब हरियाली दिखाई देती है। गांव के कई लोग पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने लगे हैं।
स्थानीय किसान विनोद, जो अब खुद भी पेड़ लगा रहे हैं, बताते हैं कि कुणियाल ने उन्हें पौधे दिए और पेड़ों के महत्व के बारे में समझाया। उनके घर में अब अमरूद और संतरे के पेड़ हैं, जो फल देने के साथ-साथ वातावरण को भी सुंदर बनाते हैं।
इसी तरह किसान हरीश पांडे भी कुणियाल से प्रेरित होकर अपने खेत में पौधे लगा रहे हैं। वे कहते हैं कि उनके बगीचे में अब पक्षी और अन्य जीव आने लगे हैं, जो एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है।
एक व्यक्ति, बड़ा बदलाव
आज जगदीश कुणियाल द्वारा लगाए गए पेड़ों की संख्या एक लाख से अधिक हो चुकी है। वे अब भी रुकने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि वे गांव के अलग-अलग हिस्सों में और पेड़ लगाने का काम जारी रखेंगे।
वे मानते हैं कि पेड़ लगाना केवल पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि समाज के भविष्य के लिए भी जरूरी है।
कुणियाल कहते हैं,
“जब आप पेड़ लगाते हैं, तो उन्हें अपने बच्चों की तरह संभालना पड़ता है। अगर आप उनकी देखभाल करेंगे, तो वे आपको एक बेहतर और समृद्ध भविष्य देंगे।”
उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति पूरे समाज में बदलाव ला सकती है। बागेश्वर के एक साधारण किसान ने यह दिखा दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो बंजर ज़मीन भी जंगल में बदल सकती है।




