“छोटे-से फूल और छोटी-सी देहरी के बीच अपनी स्मृतियों के साथ खड़ा पूरा पहाड़।”
सुबह की पहली धूप अभी पहाड़ की ढलानों को छू ही रही है। ओस से भीगी घास पर छोटे-छोटे पाँवों के निशान बनते जा रहे हैं। गाँव के खेतों के पास ही बुराँश के पेड़ लाल हो उठे हैं, और खेतों में सरसों के पीले फूल हवा में लहलहा रहे हैं।
लगभग पाँच-छह बच्चे हाथ में टोकरी लिए पगडंडी पर उछलते-कूदते फूलों की ओर बढ़ रहे हैं।
क्यों?
क्योंकि आज कोई साधारण दिन नहीं है।
आज चैत्र संक्रांति है।
आज फूलदेई है।
सबसे आगे चल रही है आठ साल की गौरा। वह सावधानी से बुराँश के फूल तोड़ती है। घर से निकलते समय उसकी दादी ने समझाया था — “फूल तोड़ो, शाख मत तोड़ना।”
फूलदेई केवल त्योहार नहीं, अनुशासन भी है।
गौरा मुस्कुराते हुए फूल टोकरी में रखती है। उसे पता है — आज हर घर की देहरी पर पहली दस्तक वही देगी।
फूल इकट्ठा कर बच्चे वापस गाँव की ओर बढ़ते हैं। पहली चौखट पर पहुँचकर वे फूल रखते हैं और एक स्वर में गाते हैं —
“फूल देई, छम्मा देई…”
उनकी आवाज़ पहाड़ी हवा में घुल जाती है। आसपास खड़े लोग मुस्कुराते हुए देख रहे हैं। भीतर से आँगन का दरवाज़ा खुलता है। एक बूढ़ी दादी बाहर आती हैं। वह बच्चों की टोकरी में चावल की एक मुट्ठी और थोड़ा-सा गुड़ डाल देती हैं।
उनके चेहरे पर संतोष है — देहरी पर फूल आ गए हैं, वर्ष भर घर भरा रहेगा।
यह दृश्य किसी फिल्म की तरह सरल लगता है, पर इसके पीछे सदियों की परंपरा है।
फूलदेई उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों अंचलों में मनाया जाने वाला वसंत-पर्व है। यह हर वर्ष चैत्र संक्रांति को आता है — जब सर्दियों की कठोरता पीछे छूटती है और पहाड़ में नई ऋतु का आरंभ होता है।
कृषि-चक्र की दृष्टि से यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेतों की तैयारी शुरू होती है। पेड़ों पर कोपलें फूटती हैं। बुराँश और फ्योंली खिलते हैं। प्रकृति का नवजीवन ही फूलदेई का आधार है।
देहरी इस पर्व का केंद्र क्यों है?
पहाड़ के घरों में देहरी केवल पत्थर की चौखट नहीं; वह घर और संसार के बीच की सीमा है। लोकविश्वास कहता है – यहीं से सुख-दुःख भीतर प्रवेश करते हैं।
जब बच्चे फूल रखकर आशीर्वाद के गीत गाते हैं, तो वे दरअसल पूरे घर के संतुलन की कामना कर रहे होते हैं।
गौरा अगली चौखट पर फूल रखती है। उसका छोटा भाई गीत की अगली पंक्ति भूल जाता है। उसी समय गौशाला की ओर जाती उसकी माँ हँसते हुए उसे अगली पंक्ति याद दिला देती है।
इस हँसी में भी परंपरा की निरंतरता छिपी है।
फूलदेई बच्चों का त्योहार है – क्योंकि भविष्य उन्हीं के हाथ में है। आज गाँव का हर घर उनके कदमों से जुड़ता है। अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा – सबकी देहरी समान है।
लोकविश्वास और यथार्थ
कुछ लोग फूलदेई को समृद्धि की देवी से जोड़ते हैं। कुछ इसे धरती माता के आशीर्वाद का दिन मानते हैं।
पर तथ्य यह है कि यह पर्व वसंत और कृषि-चक्र का उत्सव है। जब हिमालयी समाज पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, तब ऋतु-परिवर्तन का स्वागत करना अस्तित्व का प्रश्न था। फूलदेई उसी स्वीकृति का सांस्कृतिक रूप है।
अब धूप ढलानों से उतरकर पूरे गाँव में फैल चुकी है। बच्चे पूरे गाँव का चक्कर लगा चुके हैं। उनकी टोकरी में चावल, गुड़ और कुछ सिक्के जमा हो गए हैं।
वे उत्साह से खेतों की ओर भागते हैं और किसी मेड़ पर बैठकर सब कुछ आपस में बाँट लेते हैं।
गौरा की आँखों में चमक है। उसे शायद अभी यह नहीं पता कि वह केवल चावल और गुड़ नहीं बाँट रही; वह परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
शाम ढलती है। देहरियों पर रखे फूल हल्की हवा में सूखने लगते हैं।
पर उनके पीछे छोड़ी गई कामना ताज़ा रहती है - घर भरा रहे, खेत हरे रहें, और संबंध जीवित रहें।
फूलदेई किसी बड़े शोर का पर्व नहीं है। इसमें पटाखे नहीं, बाज़ार नहीं।
इसमें बस फूल हैं, बच्चे हैं, और देहरी की शांत पवित्रता है।
और शायद यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है –
एक छोटा-सा फूल, जो पूरे वर्ष के संतुलन की कथा कह जाता है।




