उत्तराखंड के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो बड़े राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ी होने के बावजूद अक्सर चर्चा से बाहर रह जाती हैं। ऐसी ही एक घटना है तिलाड़ी कांड।
आज उत्तरकाशी जिले के बड़कोट क्षेत्र के पास यमुना नदी के तट पर स्थित तिलाड़ी का मैदान शांत दिखाई देता है। लेकिन 1930 की गर्मियों में यही स्थान एक दर्दनाक घटना का साक्षी बना था।
इतिहास में इसे तिलाड़ी कांड के नाम से जाना जाता है और कई लोग इसे गढ़वाल का जलियांवाला बाग भी कहते हैं।
लेकिन इस घटना के पीछे की कहानी क्या थी?
पृष्ठभूमि: टिहरी रियासत और बढ़ता असंतोष
1930 का समय भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था। देश के कई हिस्सों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन तेज हो रहे थे।
इसी समय कई रियासतों में भी जनता अपने अधिकारों को लेकर आवाज उठाने लगी थी।
टिहरी गढ़वाल उस समय एक स्वतंत्र रियासत थी। यहाँ के लोगों में विशेष रूप से वन कानूनों और कर व्यवस्था को लेकर असंतोष बढ़ रहा था।
ग्रामीणों को जंगलों से लकड़ी और घास लेने पर रोक लगाई जा रही थी। चराई पर भी नियंत्रण कड़ा किया जा रहा था।
पहाड़ के जीवन में जंगल केवल संसाधन नहीं होते, बल्कि जीवन का आधार होते हैं। इसलिए इन प्रतिबंधों का सीधा प्रभाव लोगों की आजीविका पर पड़ रहा था।
30 मई 1930: वह दिन
इन परिस्थितियों के बीच स्थानीय लोगों ने अपने अधिकारों की मांग को लेकर तिलाड़ी मैदान में एक सभा आयोजित की।
यह सभा यमुना नदी के किनारे बसे इसी मैदान में हुई, जो आज बड़कोट क्षेत्र के पास स्थित है।
कई ऐतिहासिक विवरणों में इस सभा को शांतिपूर्ण बताया गया है। लेकिन रियासत की सेना को आशंका थी कि यह आंदोलन विद्रोह का रूप ले सकता है।
स्थिति अचानक बिगड़ गई और सेना की ओर से गोलीबारी शुरू हो गई।
इस गोलीबारी में कई ग्रामीण मारे गए। मृतकों की सटीक संख्या को लेकर इतिहास में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, लेकिन स्थानीय स्रोतों में दर्जनों लोगों के मारे जाने का उल्लेख किया जाता है।
कहा जाता है कि कई लोग गोलियों से बचने के लिए यमुना नदी में कूद गए, जिनमें से कुछ की डूबने से भी मृत्यु हो गई।
“गढ़वाल का जलियांवाला बाग” क्यों कहा जाता है
1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग हत्याकांड में भी निहत्थी भीड़ पर गोली चलाई गई थी।
तिलाड़ी की घटना में भी निहत्थे ग्रामीणों पर गोलीबारी हुई थी।
इसी कारण कई लोग तिलाड़ी कांड की तुलना जलियांवाला बाग से करते हैं और इसे “गढ़वाल का जलियांवाला बाग” कहा जाता है।
हालाँकि दोनों घटनाओं की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ अलग थीं, फिर भी जनता की स्मृति में यह तुलना गहराई से दर्ज है।
घटना का प्रभाव
तिलाड़ी कांड के बाद टिहरी रियासत के खिलाफ असंतोष और बढ़ गया।
यह घटना गढ़वाल क्षेत्र में राजनीतिक चेतना के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखी जाती है।
आने वाले वर्षों में टिहरी रियासत के खिलाफ आंदोलन और तेज हुए। अंततः 1949 में टिहरी राज्य का भारतीय संघ में विलय हो गया।
स्मृति और वर्तमान
आज तिलाड़ी में शहीदों की स्मृति में एक स्मारक स्थापित है। हर वर्ष स्थानीय लोग इस घटना को याद करते हैं और शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं।
हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर यह घटना उतनी चर्चा में नहीं आती, जितनी कि उत्तराखंड के इतिहास में इसकी महत्ता को देखते हुए आनी चाहिए।
इस घटना से क्या सीख मिलती है
तिलाड़ी कांड केवल एक गोलीकांड की घटना नहीं थी।
यह पहाड़ के लोगों की जंगल, आजीविका और अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक था।
यह भी याद दिलाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था, बल्कि दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में भी लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।
अंतिम विचार
आज यमुना के किनारे स्थित तिलाड़ी का मैदान शांत दिखाई देता है।
लेकिन 1930 की वह घटना इतिहास में दर्ज है।
तिलाड़ी हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी छोटे और दूरस्थ स्थान भी बड़े संघर्षों और बलिदानों के साक्षी बन जाते हैं।




