उत्तराखंड के शहरों में रोज निकलता है 702 टन गीला कचरा, निस्तारण का दबाव घटाने के लिए क्या है सरकार की योजना?

नगर निकाय क्षेत्रों में रोजाना निकलने वाले कुल ठोस कचरे में करीब 702 टन गीला कचरा है, जिसे दूर की लैंडफिल साइटों तक पहुंचाने की जरूरत घटाने की कोशिश की जा रही है। देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे जिलों में उपलब्ध जैविक कचरे की मात्रा इस व्यवस्था के लिए अहम हो सकती है। लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में कचरे की उपलब्धता और परिवहन की व्यवहारिकता के बीच संतुलन योजना की बड़ी चुनौती रहेगी।
Municipal wet organic waste being processed at a biogas facility in an urban Uttarakhand setting

देहरादून, 29 अगस्त। उत्तराखंड के शहरों में बढ़ते कचरे के निस्तारण के लिए अब गीले कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की तैयारी की जा रही है। शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले जैविक कचरे को स्थानीय स्तर पर प्रोसेस कर उससे गैस और खाद तैयार करने की योजना है। इससे कचरे को दूर स्थित निस्तारण स्थलों तक ले जाने की जरूरत भी कम हो सकती है।

शहरी विकास विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के नगर निकाय क्षेत्रों से प्रतिदिन करीब 1,984 टन ठोस कचरा निकलता है। इसमें लगभग 702 टन गीला कचरा और 650 टन सूखा कचरा शामिल है। अब गीले कचरे के निस्तारण के लिए नगर निकायों में बायोगैस या कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट विकसित करने की तैयारी है।

शहरी विकास विभाग के निदेशक विनोद गिरि गोस्वामी के अनुसार, घरों के साथ होटल, बाजार और सब्जी मंडियों से निकलने वाले जैविक कचरे को ऐसे प्लांट तक पहुंचाया जा सकेगा। यहां कचरे से गैस तैयार की जाएगी, जबकि प्रक्रिया के बाद बचने वाले जैविक पदार्थ का इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकेगा।

“नगर निकायों में सीबीजी प्लांट लगाने की दिशा में काम किया जा रहा है। घरों, बाजारों, होटल और मंडियों से निकलने वाले गीले और जैविक कचरे का इस्तेमाल कर सीबीजी बनाई जाएगी। इससे कूड़े का निस्तारण होगा और लैंडफिल पर दबाव कम होगा। बचने वाले जैविक पदार्थ से खाद भी तैयार की जा सकेगी।”
— विनोद गोस्वामी, निदेशक, शहरी विकास

विभागीय आंकड़ों के अनुसार, देहरादून जिले के शहरी निकायों से प्रतिदिन करीब 258 टन गीला कचरा निकलता है। हरिद्वार जिले के निकायों में यह मात्रा करीब 155 टन, जबकि ऊधम सिंह नगर जिले में करीब 121 टन प्रतिदिन है। ऐसे क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध जैविक कचरे का इस्तेमाल गैस उत्पादन के लिए किया जा सकता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य गीले कचरे को सीधे डंपिंग या लैंडफिल साइट तक भेजने के बजाय उसी क्षेत्र में प्रोसेस करना है। ऐसा होने पर नगर निकायों पर कचरे की ढुलाई का दबाव कम होने के साथ जैविक कचरे का दोबारा इस्तेमाल भी संभव होगा।

उत्तराखंड में इस तकनीक पर पहले भी काम शुरू हो चुका है। रुद्रपुर में 50 टन प्रतिदिन क्षमता वाला बायो-कंप्रेस्ड गैस प्लांट विकसित किया गया है, जहां जैविक नगर निकाय कचरे से गैस तैयार करने की व्यवस्था है। अब इसी तरह की व्यवस्था दूसरे शहरी क्षेत्रों में भी विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।

राज्य में सूखे कचरे से बिजली तैयार करने के विकल्प पर भी काम किया गया था। हालांकि पहाड़ी इलाकों में किसी एक स्थान पर लगातार पर्याप्त मात्रा में सूखा कचरा उपलब्ध कराना चुनौती बना हुआ है। अलग-अलग निकायों से कचरा एक जगह पहुंचाने पर परिवहन खर्च बढ़ने की समस्या भी सामने आती है।

इसी वजह से गीले कचरे को स्थानीय स्तर पर प्रोसेस कर बायोगैस या CBG बनाने के विकल्प को ज्यादा व्यावहारिक माना जा रहा है। योजना लागू होने पर नगर निकायों को कचरा निस्तारण का एक अतिरिक्त विकल्प मिलेगा और जैविक कचरे से ऊर्जा तथा खाद दोनों तैयार किए जा सकेंगे।

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में किन क्षेत्रों को ग्लेशियर झीलों से खतरा, 13 झीलें चिह्नित; सरकार बढ़ाएगी निगरानी और अर्ली वार्निंग

यह भी पढ़ें: 27 साल बाद भद्रा रहित रक्षाबंधन का दावा, पांच शुभ योग भी बनेंगे; जानें राखी बांधने का सही समय