मैं, पहाड़ का चूल्हा


मैं मिट्टी से बना था। न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ। मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की महक थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था। मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा।
उत्तराखंड के पत्थर के घर की रसोई में मिट्टी का चूल्हा और पीछे रखा गैस चूल्हा

लकड़ी की आँच से गैस की नीली लौ तक – एक चूल्हे की आत्मकथा

मैं मिट्टी से बना था।
न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ।
मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की गंध थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था।

मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा, जहाँ खिड़की से धूप तिरछी आती थी और धुएँ की पतली रेखा आकाश की ओर उठती थी।
मैं केवल चूल्हा नहीं था।
मैं घर का केंद्र था।

जब मुझे “घसना” और “लीपना” होता था

हर सप्ताह मुझे घिसा जाता था।
गोबर और मिट्टी के घोल से मुझे लीपा जाता।
मेरे किनारे चमकते थे-चम-चम नहीं, पर सादगी की अपनी चमक से।

लिपाई केवल सफ़ाई नहीं थी; वह आदर था।
घर की बहू जब मुझे लीपती, तो उसके माथे पर पसीना होता, पर आँखों में संतोष।
मैं फिर से नया हो जाता था।

मेरे ऊपर रखी हाँडी में दाल उबलती थी।
लोहे की तवे पर रोटियाँ सिकती थीं।
और उस धुएँ में एक पूरी दुनिया पकती थी-
स्वाद, श्रम और साथ।

मैं रसोई नहीं, मिलन-स्थल था

पहाड़ में रसोई सबसे गर्म जगह होती थी।
सर्दियों की रातों में पूरा परिवार मेरे चारों ओर बैठता।
दादी कहानी सुनाती।
बच्चे अंगारों को फूँक मारकर लाल करते।
कभी कोई आलू अंगारों में दबा दिया जाता-
धीरे-धीरे पकने के लिए।

मेरे पास बैठकर ही निर्णय होते थे।
फसल की चर्चा, विवाह की बात, दुख-सुख का बाँटना-
सब मेरे सामने होता था।

मैं साक्षी था-
घर के हर मौसम का।

लकड़ी की महक

मेरी आँच केवल ताप नहीं देती थी; वह पहचान देती थी।
चीड़ की लकड़ी की अपनी गंध, बुराँश की अपनी।
धुआँ आँखों में चुभता था, पर उसी धुएँ में पहाड़ की मिट्टी की गंध थी।

हाँ, मैं कठिन भी था।
धुआँ था, कालिख थी।
औरतों की आँखें जलती थीं।
फेफड़ों में धुआँ उतरता था।

पर मैं श्रम और प्रेम दोनों का प्रतीक था।

और फिर एक दिन…

एक दिन रसोई में चमकदार चूल्हा-सिलिंडर आया।
नीली लौ जली-बिना धुएँ के, बिना लकड़ी के।

मैं एक कोने में खिसका दिया गया।

पहले कुछ दिन मुझे लगा-
यह अस्थायी है।
पर धीरे-धीरे मेरे ऊपर राख जमने लगी।

अब मुझे कोई नहीं घिसता।
कोई गोबर-मिट्टी से नहीं लीपता।
मैं अब चमकता नहीं।

मैंने क्या खोया?

मैंने केवल अपना काम नहीं खोया।
मैंने घर का केंद्र खो दिया।

अब रसोई जल्दी निपट जाती है।
गैस की लौ तेज़ है, पर उसके पास बैठकर कहानी नहीं कही जाती।
कोई अंगारों में आलू नहीं दबाता।
कोई धुएँ की गंध से मौसम नहीं पहचानता।

सुविधा आई है-और आनी भी चाहिए थी।
औरतों की आँखों का धुआँ कम हुआ।
समय बचा।
स्वास्थ्य सुधरा।

पर उस समय के साथ कुछ और भी चला गया-
रसोई की सामूहिकता।

मैं शिकायत नहीं करता

मैं जानता हूँ-समय बदलता है।
पहाड़ भी बदल रहा है।
गैस की नीली लौ आधुनिकता की निशानी है।

पर कभी-कभी, जब सर्दी की रात होती है और बाहर बर्फ़ गिरती है,
तो कोई पुराना हाथ मुझे फिर से जलाता है।
लकड़ी की एक पतली लकड़ी सुलगती है।
रसोई में धुएँ की पतली लकीर उठती है।

और तब मुझे लगता है-
मैं अभी पूरी तरह गया नहीं हूँ।

मैं क्या था?

मैं आधार था।
मैं सहारा था।
मैं घर की धड़कन था।

मेरे सामने बच्चे बड़े हुए।
मेरे पास बैठकर बुज़ुर्गों ने अंतिम साँस ली।

मैंने पहाड़ की पीढ़ियों को जोड़ा।

आज गैस की लौ चमकती है-साफ़, नीली और तेज़।
और मैं, मिट्टी का पुराना चूल्हा, कोने में चुप खड़ा हूँ।

पर मेरी राख में अब भी स्मृतियाँ गरम हैं।

क्योंकि पहाड़ की असली आँच केवल लकड़ी में नहीं थी-
वह साथ बैठने में थी।