पहाड़ की स्मृति, विश्वास की कहानी
हमारे गाँव की चढ़ाई के बीच, जहाँ पगडंडी थोड़ी समतल होकर साँस लेने का अवसर देती थी, वहीं एक छोटी-सी राशन की दुकान हुआ करती थी। टीन की छत, लकड़ी का दरवाज़ा, भीतर मिट्टी और गुड़ की मिली-जुली गंध, और दीवार से सटी लकड़ी की अलमारियाँ–जिनमें चीनी, नमक, चायपत्ती और मिट्टी का तेल रखा रहता था।
दुकान के कोने में एक मोटी-सी कॉपी रहती थी–नीली जिल्द, किनारों से मुड़ी हुई, पन्नों पर उँगलियों के हल्के निशान। गाँव में सब उसे “उधार की कॉपी” कहते थे। उसमें नाम लिखे होते थे–किसी के आगे दो किलो चावल, किसी के आगे आधा लीटर तेल, किसी के आगे पाँच रुपये का साबुन। पर उन अंकों के पीछे केवल वस्तुएँ नहीं, परिस्थितियाँ दर्ज होती थीं।
पहाड़ का जीवन सीधा नहीं होता। कभी फसल अच्छी होती है, कभी ओलावृष्टि एक ही शाम में महीनों की मेहनत बहा ले जाती है। कभी गाय बीमार पड़ जाती है, कभी बच्चे की फीस अचानक भरनी पड़ती है। ऐसे समय में राशन की दुकान ही वह जगह होती थी, जहाँ बिना झिझक कहा जा सकता था–
“आज लिख देना… अगले महीने दे देंगे।”
दुकानदार बिना माथा सिकोड़ें नाम पूछता, तारीख लिखता और कह देता–“चिंता मत कर।”
उस एक वाक्य में व्यापार नहीं, अपनापन होता था।
उधार लेना वहाँ अपमान नहीं था; उसे लौटाना सम्मान था। महीने के अंत में जब घर का हिसाब जोड़ा जाता, तो सबसे पहले उसी कॉपी का ध्यान आता। पर पहाड़ के कई घरों में एक और दृश्य जुड़ा होता था–डाकिए की प्रतीक्षा का।
जिन परिवारों का कोई सदस्य बाहर नौकरी करता था–सेना में, शहर की फैक्ट्री में, या किसी दफ्तर में–उनके लिए महीने का सबसे महत्त्वपूर्ण दिन वह होता, जब दूर से डाकिए की सीटी सुनाई देती। घर की माँ या दादी दरवाज़े तक आ जातीं और हल्की-सी चिंता और आशा के साथ पूछतीं–
“हमारा कुछ आया है क्या?”
डाकिया मुस्कराकर मनीऑर्डर का काग़ज़ थमा देता। हाथ में वह फॉर्म आते ही घर में जैसे रोशनी फैल जाती। माँ उसे सँभालते हुए बुदबुदाती–
“पहले दुकान का हिसाब चुकता करना है… बाकी सब काम बाद में।”
फिर किसी दिन दादा जी या माँ ही दुकान की ओर जाते। कॉपी खुलती। नाम के आगे लिखी रकम पर उँगली फिरती। दादा जी धीरे से पूछते–
“लाला जी, कितना उधार था हमारा?”
दुकानदार पन्ना देखकर कहता–“बस इतना ही।”
और पैसे गिनते हुए दादा जी कहते–“लो भाई, पूरा कर दो।”
कभी-कभी यदि पैसे थोड़े कम पड़ जाते, तो वह मुस्कराकर कहता–
“कोई बात नहीं… अगले महीने दे देना।”
और हिसाब पूरा होने पर दादा जी हल्के से कहते–“धन्यवाद, लाला जी।”
वह चेहरे की ओर देख कर थोड़ी देर रुकता और कहता–
“अरे, धन्यवाद किस बात का… अपना ही तो है।”
उस क्षण केवल उधार नहीं चुकता होता था; एक महीने की चिंता हल्की होती थी, घर की प्रतिष्ठा संतुलित होती थी, और दुकानदार के चेहरे पर वही शांत मुस्कान लौट आती थी।
राशन की दुकान केवल लेन-देन का स्थान नहीं थी। वहीं शाम को लोग बैठते, मौसम की चर्चा होती, किसी की फसल की बात होती, किसी के बेटे की भर्ती की खबर साझा होती। दुकान उस समय एक छोटा-सा चौपाल थी–जहाँ आर्थिक व्यवस्था के साथ सामाजिक जीवन भी चलता था।
आज वही दुकान बदली हुई है। काउंटर के पास मशीन है, मोबाइल से भुगतान होता है, रसीद तुरंत निकल आती है। सुविधा बढ़ी है, हिसाब साफ़ है। पर उस मोटी कॉपी के पन्नों की गरमाहट अब दिखाई नहीं देती। अब “लिख देना” की जगह “भेज देना” ने ले ली है।
यह परिवर्तन आवश्यक भी था–समय के साथ साधन बदलते हैं। पर कभी-कभी मन पूछता है–क्या सुविधा के साथ हमने उस आत्मीयता का एक अंश खो दिया? वह भरोसा, जो बिना दस्तावेज़ और गारंटी के चलता था, क्या अब भी उतना ही सजीव है?
राशन की दुकान और उधार की कॉपी हमें याद दिलाती हैं कि पहाड़ की असली पूँजी उसकी जमीन या फसल नहीं, बल्कि उसके लोग थे–जो एक-दूसरे के कठिन समय में साथ खड़े रहते थे। उधार की वह कॉपी केवल कर्ज़ का लेखा नहीं थी; वह सामुदायिक उत्तरदायित्व का अभिलेख थी।
आज जब हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, तो शायद आवश्यकता इस बात की है कि साधन चाहे बदल जाएँ, पर विश्वास की वह परंपरा न टूटे। क्योंकि पहाड़ की सभ्यता हमेशा इसी अदृश्य डोर पर टिकी रही है–जहाँ कोई कह सके, “लिख देना,” और सामने वाला बिना शर्त लिख दे।
और संभव है–आज भी पहाड़ के किसी दूरस्थ गाँव में, जहाँ सड़क पूरी तरह नहीं पहुँची, जहाँ मोबाइल का नेटवर्क आता-जाता रहता है, यह परंपरा अब भी जीवित हो। वहाँ आधुनिकता ने अभी अपने पैर पूरी तरह नहीं पसारे हों।
क्योंकि पहाड़ में परिवर्तन धीरे आता है। और विश्वास, यदि एक बार जड़ पकड़ ले, तो वह पीढ़ियों तक बना रहता है।
शायद सच यही है–
उधार की वह कॉपी केवल अतीत नहीं थी; वह पहाड़ की आत्मा का एक पन्ना थी।
और वह पन्ना अब भी कहीं लिखा जा रहा है–बस हमें उसे पढ़ने की दृष्टि बचाए रखनी है।




