अगर आपसे पूछा जाए कि प्रेम क्या होता है, तो शायद हर व्यक्ति इसका अलग उत्तर देगा।
किसी के लिए प्रेम विश्वास है, किसी के लिए त्याग, और किसी के लिए नियति का अदृश्य बंधन।
भारतीय लोक परंपरा में राधा-कृष्ण, हीर-रांझा और सोहनी-महिवाल जैसी अनेक प्रेम कथाएँ सुनाई जाती हैं।
इसी परंपरा में उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की एक प्रसिद्ध लोकगाथा भी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है – राजुला और मालूशाही की कथा।
यह कहानी केवल प्रेम की नहीं मानी जाती। कुमाऊँ की लोकसंस्कृति में इसे लोकगीतों, जागरों और कथाओं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाया जाता रहा है।
कथा की शुरुआत: एक संतान की कामना
लोकगाथाओं के अनुसार कहानी की शुरुआत कुमाऊँ के बैराठ से होती है।
इतिहासकार बैराठ को आज के चौखुटिया क्षेत्र से जोड़कर देखते हैं।
कहा जाता है कि यहाँ कत्यूरी वंश के राजा दुलाशाह (या दुलाशाही) का शासन था।
राजा और उनकी रानी धर्मा के पास वैभव और प्रतिष्ठा सब कुछ था, लेकिन संतान न होने के कारण वे दुखी रहते थे।
लोककथा के अनुसार एक रात रानी ने स्वप्न में बागनाथ भगवान के दर्शन किए।
इस संकेत को आशा मानकर राजा-रानी बागेश्वर पहुंचे।
वहीं उनकी मुलाकात भोट के व्यापारी सुनपति शौका और उनकी पत्नी गांगुली से हुई।
वे भी संतान की कामना लेकर मंदिर आए थे।
कहते हैं कि साझा पीड़ा लोगों को करीब ले आती है।
दोनों परिवारों ने एक वचन लिया – यदि एक के घर पुत्र और दूसरे के घर पुत्री जन्मे, तो उनका विवाह कराया जाएगा।
यही वचन आगे चलकर इस लोककथा की नींव बनता है।
जन्म और एक भविष्यवाणी
कुछ समय बाद लोकमान्यता के अनुसार राजा दुलाशाह के घर मालूशाही और सुनपति शौका के घर राजुला का जन्म हुआ।
कथा में यह भी बताया जाता है कि मालूशाही के जन्म के बाद ज्योतिषियों ने एक भविष्यवाणी की।
उन्होंने कहा कि बालक की आयु पर संकट है और इसे टालने के लिए जन्म के पाँचवें दिन विवाह कराना होगा।
राजा को सुनपति शौका से किया गया वचन याद आया और संदेश भेजा गया।
इसके बाद नवजात राजुला और मालूशाही का प्रतीकात्मक विवाह करा दिया गया।
एक अफवाह और वर्षों का मौन
लोककथा आगे बताती है कि विवाह के कुछ समय बाद ही राजा दुलाशाह का निधन हो गया।
दरबार में यह चर्चा फैल गई कि जिस कन्या के विवाह के बाद यह घटना हुई, उसका बैराठ आना अशुभ माना जाएगा।
इसलिए यह निर्णय लिया गया कि बड़े होने पर मालूशाही को इस विवाह के बारे में नहीं बताया जाएगा।
इस तरह वर्षों तक यह बात छिपाकर रखी गई।
पहचान का पहला एहसास
समय बीतता गया और दोनों युवा हो गए।
उधर सुनपति शौका को चिंता होने लगी कि बैराठ से कोई संदेश क्यों नहीं आ रहा।
इसी दौरान एक दिन राजुला ने अपनी माँ से कई सवाल पूछे।
लोककथा के अनुसार उसने पूछा:
- दिशाओं में सबसे प्रिय दिशा कौन
- नदियों में सबसे बड़ी नदी कौन
- राजाओं में सबसे महान कौन
माँ ने उत्तर दिया –
सबसे प्रिय दिशा पूर्व, सबसे पवित्र नदी भागीरथी, और राजाओं में सबसे प्रसिद्ध रंगीला बैराठ का राजा मालूशाही।
यह सुनकर राजुला के मन में एक अनजाना आकर्षण जाग उठा।
उसने इच्छा जताई कि उसका विवाह बैराठ में ही हो।
संकट का आरंभ
उधर राजुला की सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी।
लोककथा के अनुसार हूण देश के राजा विक्खीपाल को भी इसकी खबर मिली और उसने विवाह का प्रस्ताव भेजा।
कहा जाता है कि प्रस्ताव अस्वीकार होने पर उसने धमकी भी दी।
इसी बीच मालूशाही को भी स्वप्न में राजुला के दर्शन होने का उल्लेख लोककथा में मिलता है।
उधर राजुला को भी ऐसा ही स्वप्न आया बताया जाता है।
इन घटनाओं के बाद राजुला ने स्वयं बैराठ जाने का निर्णय लिया।
बैराठ की यात्रा और अधूरी मुलाकात
लोकगाथा के अनुसार राजुला कठिन पहाड़ी मार्ग पार कर बैराठ पहुँची।
लेकिन वहाँ परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं।
कहा जाता है कि रानी ने मालूशाही को जड़ी-बूटी देकर सुला दिया ताकि दोनों की मुलाकात न हो सके।
राजुला ने उसे जगाने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुई।
आखिरकार उसने मालूशाही की उंगली में हीरे की अंगूठी पहनाई और एक पत्र छोड़कर वापस लौट गई।
पत्र में उसने लिखा कि यदि वह सचमुच उसे चाहता है, तो उसे हूण देश आकर ले जाए।
गुरु गोरखनाथ की शरण
जब मालूशाही को पत्र मिला, तो वह गहरे दुख में डूब गया।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
लोककथा के अनुसार उसने गुरु गोरखनाथ की शरण ली।
कहा जाता है कि गुरु ने उसे दीक्षा दी और कठिन मार्ग के लिए तैयार किया।
इसके बाद मालूशाही ने जोगी का वेश धारण किया और हूण देश की ओर प्रस्थान किया।
पहचान और संघर्ष
कथा के अनुसार हूण देश में मालूशाही की मुलाकात राजुला से भिक्षा मांगते समय हुई।
संवाद के दौरान दोनों एक-दूसरे को पहचान गए।
लेकिन राजा विक्खीपाल को संदेह हो गया।
लोककथा में बताया जाता है कि उसने भोजन में विष मिलाकर मालूशाही और उसके साथियों को बेहोश करवा दिया।
इसके बाद गुरु गोरखनाथ के हस्तक्षेप और युद्ध का उल्लेख मिलता है।
अंततः मालूशाही विजयी हुआ।
अंततः मिलन
विजय के बाद मालूशाही राजुला को लेकर बैराठ लौटा।
वहाँ पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया और दोनों का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ।
इस तरह लोककथा प्रेम, संघर्ष और विश्वास के साथ एक संतुलित अंत तक पहुँचती है।
लोकसंस्कृति में महत्व
राजुला-मालूशाही की कहानी कुमाऊँ की सबसे प्रसिद्ध लोकगाथाओं में गिनी जाती है।
इसे जागर, लोकगीत और लोकनाट्य के रूप में आज भी सुनाया जाता है।
यह केवल प्रेम कथा नहीं मानी जाती, बल्कि वचन, विश्वास और धैर्य की प्रतीक कहानी के रूप में देखी जाती है।
अंत में
लोककथाएँ केवल इतिहास नहीं होतीं।
वे समाज की स्मृति और संस्कृति का हिस्सा होती हैं।
राजुला-मालूशाही की कथा भी उसी परंपरा का हिस्सा है, जहाँ प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक कठिन यात्रा बन जाता है।
शायद इसी भाव को एक पंक्ति में कहा गया है –
प्रेम आसान नहीं होता; यह मानो आग का दरिया है, जिसमें उतरना ही पड़ता है।




