90 के दशक का देहरादून: एक शांत शहर और अपनेपन से भरी ज़िंदगी

90 के दशक का देहरादून एक शांत, धीमी रफ्तार और अपनापन भरा शहर था। उस दौर की गलियाँ, मोहल्ले और रिश्ते आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं।
देहरादून के घंटाघर क्षेत्र का सड़क दृश्य

90 के दशक का देहरादून
एक शांत शहर और अपनेपन से भरी ज़िंदगी

जब हम यादों में पीछे लौटते हैं, तो देहरादून का एक अलग ही रूप सामने आता है। आज का देहरादून तेज़ रफ्तार, ट्रैफिक और ऊँची इमारतों वाला शहर बन चुका है।

लेकिन 90 के दशक का देहरादून कुछ और ही था-शांत, सादा और बहुत अपनापन भरा।

उस समय शहर की रफ्तार धीमी थी। लोग जल्दी में कम और सुकून में ज़्यादा दिखाई देते थे। सड़कें भीड़ से भरी नहीं होती थीं, बल्कि पहचान से भरी होती थीं।

घंटाघर उस समय भी शहर के बीचों-बीच खड़ा रहता था। वहीं से देहरादून की रोज़मर्रा की हलचल शुरू होती थी।

पलटन बाज़ार, राजपुर रोड और चकराता रोड केवल सड़कें नहीं थीं, बल्कि शहर की पहचान थीं। शाम के समय लोग परिवार के साथ टहलने निकलते थे और बाज़ार में एक अलग ही रौनक दिखाई देती थी।

उस समय दुकानदार अपने ग्राहकों को पहचानते थे। कई घरों में सालों से एक ही दुकान से सामान लिया जाता था।

जब कोई ग्राहक दुकान पर आता, तो दुकानदार अक्सर मुस्कराकर पूछता-
“काफी दिन बाद आए… सब ठीक है ना?”

उस एक सवाल में अपनापन झलकता था।

90 के दशक का देहरादून ट्रैफिक के शोर से दूर था। सड़कों पर साइकिलें चलती थीं, रिक्शे धीरे-धीरे आगे बढ़ते थे और कभी-कभी दूर से ट्रेन की आवाज़ सुनाई देती थी।

यही आवाज़ें शहर की पहचान थीं।

मोहल्लों की ज़िंदगी भी बहुत अलग थी। घरों के सामने छोटे-छोटे आँगन होते थे। लोग शाम को बरामदे में बैठकर चाय पीते और पड़ोसियों से बातें करते थे।

पड़ोसी केवल आसपास रहने वाले लोग नहीं होते थे, बल्कि परिवार जैसे होते थे। किसी घर में खुशी हो या परेशानी, पूरा मोहल्ला साथ खड़ा दिखाई देता था।

बच्चों की दुनिया भी बहुत सरल थी। स्कूल से लौटते ही बच्चे बैग रखकर बाहर खेलने निकल जाते थे।

गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, छुपन-छुपाई-ये खेल हर मोहल्ले में चलते थे। उस समय मोबाइल या इंटरनेट नहीं था, इसलिए दोस्ती और बातचीत आमने-सामने होती थी।

देहरादून की सुबहें भी बहुत सुंदर होती थीं। मसूरी की पहाड़ियों से ठंडी हवा आती थी और पेड़ों की हरियाली शहर को ताज़गी से भर देती थी।

पक्षियों की आवाज़ और शांत सड़कों के बीच दिन की शुरुआत होती थी।

शहर शिक्षा के लिए भी जाना जाता था। स्कूल और कॉलेजों का वातावरण अनुशासित और शांत होता था।

शिक्षक केवल पढ़ाने वाले नहीं होते थे, बल्कि विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करते थे। विद्यार्थी उनका सम्मान करते थे और गुरु-शिष्य का रिश्ता मजबूत होता था।

त्योहारों के समय पूरा शहर जैसे एक परिवार बन जाता था।

दशहरा, दीपावली और होली पर गलियाँ रोशनी और खुशियों से भर जाती थीं। लोग एक-दूसरे के घर मिठाई लेकर जाते थे और त्योहार मिलकर मनाते थे।

समय के साथ देहरादून बदल गया है। जनसंख्या बढ़ी है, सड़कें व्यस्त हो गई हैं और शहर की रफ्तार तेज़ हो गई है।

नई सुविधाएँ आई हैं, जिससे जीवन आसान हुआ है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि उस पुराने समय का सुकून कहीं पीछे रह गया।

आज की पीढ़ी के लिए 90 के दशक का देहरादून शायद केवल कहानियों में है।

लेकिन जिन्होंने उस दौर को देखा है, उनके लिए वह एक खास याद है-एक ऐसा समय जब शहर छोटा था, पर दिल बड़े थे।

90 के दशक का देहरादून हमें यह याद दिलाता है कि किसी शहर की असली पहचान उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों के रिश्तों से बनती है।

वह दौर भले ही वापस न आए, लेकिन उसकी यादें आज भी देहरादून की हवा में महसूस की जा सकती है।

शायद सच यही है-
90 के दशक का देहरादून केवल एक शहर नहीं था।

वह सुकून का एहसास था।
वह अपनेपन की पहचान था।
और वह एक ऐसा समय था, जिसे याद करके आज भी मन मुस्कुरा उठता है।