देहरादून, 30 सितंबर 2026। उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को समय रहते पहचानने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो रहा है। चमोली जिले के वसुधारा ताल में राज्य का पहला रियल टाइम अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है। इससे झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ और आसपास होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी की जा सकेगी।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने 29 सितंबर को सचिवालय से वैज्ञानिक और तकनीकी दल को वसुधारा ताल के लिए रवाना किया। यह उत्तराखंड की किसी ग्लेशियर झील में निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए भेजा गया पहला वैज्ञानिक दल है। अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक प्रस्तावित है।
वसुधारा ताल में जलस्तर सेंसर, ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन, बर्फ की गहराई और तापमान मापने वाले सेंसर, जल प्रवाह सेंसर और जमीन की हलचल व कंपन को मापने वाले उपकरण लगाए जाएंगे। दुर्गम क्षेत्र में बिजली की व्यवस्था के लिए सिस्टम सौर ऊर्जा से चलेगा।
इस इलाके में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण सेंसर से मिलने वाला डेटा सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए बेस स्टेशन तक भेजा जाएगा। डेटा लॉगर और मॉनिटरिंग सिस्टम तय सीमा से असामान्य बदलाव मिलने पर अलर्ट जारी करने में मदद करेंगे।
इस व्यवस्था का मकसद Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF के खतरे को समय रहते पहचानना है। ऐसी स्थिति में ग्लेशियर झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी निकल सकता है, जिससे नीचे बसे इलाकों, सड़कों, पुलों और अन्य परियोजनाओं को खतरा पैदा हो सकता है।
वसुधारा ताल उन ग्लेशियर झीलों में शामिल है जिन्हें NDMA और अन्य तकनीकी संस्थानों ने उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा है। प्रदेश में ऐसी 13 झीलों की पहचान की गई है। वसुधारा ताल में लगने वाली प्रणाली से मिलने वाले अनुभव और आंकड़ों के आधार पर भविष्य में दूसरी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में भी इसी तरह के सिस्टम लगाने की योजना है।
अभियान में CBRI रुड़की और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के साथ SDRF, NDRF और अन्य एजेंसियों का सहयोग लिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित खतरे की पहचान पहले करने और नीचे के इलाकों को समय रहते सतर्क करने में मदद मिलेगी।
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