उत्तराखंड के पहाड़ लंबे समय से पलायन की समस्या से जूझते रहे हैं। बेहतर रोज़गार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर जाने वाले लोगों के कारण कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं। ऐसे समय में चमोली की रहने वाली दिव्या रावत ने एक अनोखी पहल की, जिसने पहाड़ में आजीविका के नए रास्ते खोलने का काम किया।
मशरूम खेती के माध्यम से उन्होंने न केवल रोजगार के अवसर पैदा किए, बल्कि उन गांवों में भी नई उम्मीद जगाई जिन्हें कभी “घोस्ट विलेज” कहा जाने लगा था।
पलायन की पीड़ा से जन्मा विचार
दिव्या रावत का जन्म और पालन-पोषण उत्तराखंड के चमोली गढ़वाल में हुआ। आगे की पढ़ाई के लिए वे दिल्ली गईं, जहां उन्होंने सामाजिक कार्य (सोशल वर्क) में स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने एक प्रमुख गैर-सरकारी संगठन में मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर काम करना शुरू किया।
दिल्ली में रहते हुए उन्हें एक बात लगातार परेशान करती थी। उत्तराखंड से आए कई लोग शहरों में छोटे-मोटे काम कर रहे थे – किसी ढाबे या चाय की दुकान पर काम करते हुए कठिन जीवन जी रहे थे – जबकि उनके गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे थे।
2013 में उत्तराखंड में आई भीषण आपदा ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। इसी समय उन्होंने तय किया कि अब वे वापस अपने राज्य लौटकर गांवों के लिए कुछ ठोस काम करेंगी।
मशरूम खेती में दिखा समाधान
दिव्या रावत को लगा कि समाधान किसी जटिल तकनीक में नहीं, बल्कि एक सरल कृषि गतिविधि में छिपा है – मशरूम खेती।
उन्होंने शोध किया, प्रशिक्षण लिया और विभिन्न किस्मों के मशरूम पर प्रयोग किए। इसके बाद उन्होंने पाया कि बटन, ऑयस्टर और मिल्की मशरूम उत्तराखंड की जलवायु में आसानी से उगाए जा सकते हैं।
मशरूम खेती का एक बड़ा लाभ यह था कि इसे घर के अंदर भी किया जा सकता है और इसके लिए बड़े खेत या महंगे ढांचे की आवश्यकता नहीं होती।
उन्होंने बांस की रैक बनाकर वर्टिकल खेती का तरीका अपनाया, जिससे कम जगह में भी उत्पादन संभव हो गया।
छोटे निवेश से शुरू हुआ उद्यम
दिव्या ने बेहद सीमित संसाधनों के साथ अपना काम शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्होंने लगभग ₹10,000 से ₹15,000 के निवेश से मशरूम उत्पादन की शुरुआत की।
बाद में उन्होंने Soumya Foods Pvt. Ltd. के माध्यम से मशरूम उत्पादन और प्रशिक्षण को व्यवस्थित रूप दिया। बाजार में मशरूम की अच्छी मांग होने के कारण उत्पादों की बिक्री में भी कोई कठिनाई नहीं आई।
धीरे-धीरे उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनका उद्देश्य था कि अधिक से अधिक लोग मशरूम खेती को अपनाकर खुद उद्यमी बनें।
दिव्या का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति ₹50,000 का निवेश भी नहीं कर सकता, तो वह केवल मशरूम बैग लेकर भी शुरुआत कर सकता है और धीरे-धीरे इस काम को आगे बढ़ा सकता है।
खाली गांवों में फिर लौटी हलचल
दिव्या रावत की पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने उन गांवों में मशरूम उत्पादन केंद्र शुरू किए जहां पलायन के कारण घर खाली हो चुके थे।
उदाहरण के तौर पर सेरियाधार गांव में कभी केवल तीन परिवार ही बचे थे। यहां मशरूम उत्पादन की शुरुआत के बाद गांव में नई गतिविधियां शुरू हुईं।
आज यहां लोग मशरूम खरीदने और इसकी खेती सीखने के लिए आने लगे हैं। कुछ लोग जो शहरों की ओर चले गए थे, वे भी वापस लौटने लगे हैं।
हजारों परिवारों को मिला नया रास्ता
दिव्या रावत की पहल अब एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
उनके प्रयासों से 15,000 से अधिक परिवार मशरूम खेती से जुड़े हैं और कई लोग इसे एक छोटे उद्यम के रूप में चला रहे हैं।
इस पहल ने खासकर महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
एक नई दिशा की कहानी
दिव्या रावत को आज देशभर में “मशरूम लेडी ऑफ इंडिया” के नाम से भी जाना जाता है। उनका मानना है कि अगर स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग किया जाए तो पहाड़ों में भी सम्मानजनक आजीविका के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
उनकी यह पहल दिखाती है कि छोटे स्तर पर शुरू किया गया एक प्रयास भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में मशरूम खेती के माध्यम से उन्होंने न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं, बल्कि उन गांवों में भी जीवन की नई उम्मीद जगाई है जो कभी पलायन के कारण सुनसान हो चुके थे।




