मानसून से पहले अलर्ट मोड में उत्तराखंड: ग्लेशियर झीलों और भूकंप खतरों से निपटने की बड़ी तैयारी

मानसून से पहले उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों और भूकंप खतरों से निपटने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम और तकनीकी तैयारी तेज।
उत्तराखंड ग्लेशियर झीलों और भूकंप खतरों से निपटने की बड़ी तैयारी के तहत सर्वेक्षण

उत्तराखंड का पहाड़ी भूगोल जितना खूबसूरत है, उतना ही संवेदनशील भी माना जाता है।
बीते वर्षों में राज्य ने कई ऐसी आपदाएँ देखी हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि यहाँ खतरे अचानक आते हैं और असर गहरा छोड़ जाते हैं।


कभी भारी वर्षा और जलप्रवाह ने तबाही मचाई, तो कभी हिमखंडों के खिसकने और ग्लेशियर से जुड़े बदलावों ने हालात बिगाड़े।

इन्हीं अनुभवों ने राज्य को यह समझने पर मजबूर किया है कि अब पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं हैं, और आपदा प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी बनाना जरूरी है।

इसी दिशा में अब उत्तराखंड सरकार मानसून से पहले अपनी तैयारियों को नए स्तर पर ले जा रही है, जहाँ फोकस है- अर्ली वार्निंग सिस्टम, डेटा आधारित निगरानी और संरचनात्मक सुरक्षा उपायों पर।

देहरादून में मुख्य सचिव आनंद बर्धन की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में राज्य की आपदा प्रबंधन रणनीतियों की समीक्षा की गई।

इस दौरान अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम (EEWS), नेशनल सिस्मिक रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम, और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसे खतरों पर विस्तार से चर्चा हुई।

इस समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था- ग्लेशियर झीलों की निगरानी और जोखिम प्रबंधन।

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी।

उन्होंने कहा: “हम वसुधारा झील को एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित कर रहे हैं, जहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और मॉनिटरिंग मैकेनिज्म स्थापित किए जा रहे हैं। यह मॉडल आगे चलकर राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में भी लागू किया जाएगा।”

मुख्य सचिव ने वाडिया संस्थान को निर्देश दिए हैं कि 2026 से 2028 की अवधि के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए।

इस योजना में केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक उपायों पर भी जोर दिया गया है, जैसे:

  • झीलों से पानी का नियंत्रित निकास
  • जल स्तर को संतुलित करना
  • संभावित जोखिम को पहले ही कम करना

भूकंप के खतरे को देखते हुए राज्य अपनी तकनीकी क्षमता भी बढ़ा रहा है।

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उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

  • 169 सेंसर और 112 सायरन पहले से सक्रिय हैं
  • IIT रुड़की के साथ हुए समझौते के तहत
  • इनकी निगरानी और अलर्ट सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है

अब इस नेटवर्क को और विस्तार देने की योजना है:

  • 500 नए ‘स्ट्रॉन्ग मोशन’ सेंसर संवेदनशील क्षेत्रों में लगाए जाएंगे
  • इसके अलावा 526 नए यूनिट्स लगाने का प्रस्ताव है
  • जिसमें 500 स्वदेशी सायरन और 26 मल्टी-हैजार्ड वार्निंग सिस्टम शामिल हैं

मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने कहा:

“हमारा लक्ष्य है कि अर्ली वार्निंग सिस्टम को और अधिक सटीक, तेज और आम लोगों तक पहुंचने योग्य बनाया जाए।”

वर्तमान में नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी उत्तराखंड में 8 भूकंपीय वेधशालाएं संचालित कर रहा है।
राज्य सरकार अब नए स्थायी केंद्र स्थापित करने की योजना बना रही है।

प्रस्तावित स्थान हैं:

  • रुद्रप्रयाग
  • देवप्रयाग
  • कर्णप्रयाग
  • रामनगर
  • बागेश्वर
  • अल्मोड़ा
  • केदारनाथ
  • चकराता


मानसून के दौरान होने वाले मलबा बहाव (debris flow) को लेकर भी तैयारी तेज की गई है।

चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में:

  • 48 अत्यधिक संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है
  • इन्हें उच्च, मध्यम और निम्न जोखिम श्रेणियों में विभाजित किया गया है


ताकि कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया जा सके।

मानसून से पहले उत्तराखंड की यह तैयारी एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है।

अब रणनीति केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि डेटा आधारित, तकनीकी और संरचनात्मक उपायों के जरिए जोखिम को पहले ही कम करने पर केंद्रित है।

हिमालय की इस संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों में यह दृष्टिकोण भविष्य में आपदाओं के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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