
मैं, पहाड़ का चूल्हा
मैं मिट्टी से बना था।
न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ।
मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की महक थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था।
मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा।

मैं मिट्टी से बना था।
न लोहे का, न मशीन से ढला हुआ।
मुझे गढ़ा गया था हाथों से-उन हाथों से जिनमें खेत की महक थी, जिनकी उँगलियों में गोबर और पीली मिट्टी की लिपाई का सौंदर्य था।
मैं पहाड़ के उस छोटे-से रसोईघर में जन्मा।