
जिस समाज में हर कोई बोल रहा है, वहाँ सुन कौन रहा है?
हम बातचीत नहीं करते, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। हम सुनते नहीं, उत्तर तैयार करते हैं। शायद हमारे समय की बहुत-सी समस्याएँ विचारों की कमी से नहीं, सुनने की कमी से पैदा हुई हैं। और जब सुनना कम होने लगता है, तो संवाद धीरे-धीरे प्रतिध्वनि में बदल जाता है। इस लेख में इसी प्रश्न पर एक विचार।





