नंदा देवी राजजात: 280 किलोमीटर की वह यात्रा जहाँ देवी को बेटी मानकर विदा किया जाता है, लेकिन क्यों?

नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। परंपरागत रूप से यह यात्रा लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है और चमोली जिले के नौटी गाँव से आरंभ होकर लगभग 280 किलोमीटर लंबे मार्ग से होमकुंड तक पहुँचती है। लोकपरंपरा में इसे नंदा देवी की अपने मायके से कैलाश स्थित ससुराल की प्रतीकात्मक यात्रा माना जाता है। यात्रा के प्रमुख पड़ावों में कुलसारी, वाण, बेदनी बुग्याल, रूपकुंड और होमकुंड शामिल हैं। चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) इस यात्रा की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक है, जबकि लाटू देवता को नंदा देवी का धर्मभाई और यात्रा का रक्षक माना जाता है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ राजजात उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकस्मृति और हिमालयी सामाजिक परंपराओं का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।
नंदा देवी राजजात यात्रा के दौरान हिमालयी पड़ाव पर श्रद्धालु और डोली

उत्तराखंड में नंदा देवी राजजात को केवल एक धार्मिक यात्रा कहना पर्याप्त नहीं है। यह यात्रा हिमालयी समाज की उस सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है, जिसमें देवी केवल पूजा की शक्ति नहीं, बल्कि घर की बेटी, बहन और कुल-परंपरा की जीवित उपस्थिति बन जाती हैं।

इसी कारण राजजात में लोग केवल दर्शन करने नहीं निकलते। वे एक विदाई में शामिल होते हैं।

यह विदाई नंदा की है।

स्थानीय परंपरा में नंदा देवी को शिव की अर्धांगिनी पार्वती का रूप माना जाता है। लेकिन गढ़वाल और कुमाऊँ के अनेक क्षेत्रों में उनका संबंध केवल शास्त्रीय देवी-परंपरा से नहीं, बल्कि लोकजीवन से भी जुड़ा है। यहाँ नंदा देवी को बेटी की तरह याद किया जाता है। वह मायके आती हैं, लोकगीतों में पुकारती हैं, गाँवों से होकर गुजरती हैं और अंततः कैलाश की ओर विदा की जाती हैं।

नंदा देवी राजजात इसी भाव का सबसे बड़ा सार्वजनिक रूप है।

परंपरागत रूप से यह यात्रा लगभग बारह वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है। इसका मार्ग लगभग 280 किलोमीटर लंबा माना जाता है और यह चमोली जिले के गाँवों, घाटियों, बुग्यालों और ऊँचे हिमालयी मार्गों से होकर होमकुंड तक पहुँचती है। यात्रा सामान्य तीर्थमार्ग की तरह स्थिर और सरल नहीं है। यह लोकदेवताओं, डोलियों, ग्राम-समुदायों, पुरोहित परंपराओं और राजवंशीय स्मृतियों से मिलकर बनी एक जटिल सांस्कृतिक संरचना है।

यात्रा का प्रमुख केंद्र नौटी गाँव माना जाता है। नौटी को नंदा देवी का मायका समझा जाता है। यहीं से देवी की विदाई की कथा आरंभ होती है। कांसुवा के कुँवर वंशज और नौटी के नौटियाल ब्राह्मण इस परंपरा में विशेष भूमिका निभाते आए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजजात केवल लोकभावना नहीं, बल्कि एक संगठित धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था भी रही है।

राजजात की सबसे रहस्यमयी परंपराओं में से एक है चौसिंग्या खाडू।

हिमालयी मार्ग पर नंदा देवी राजजात से जुड़ा चौसिंग्या खाडू

यह एक दुर्लभ चार सींगों वाला मेढ़ा होता है, जिसका जन्म स्थानीय लोग सामान्य घटना नहीं मानते। लोकमान्यताओं के अनुसार जब राजजात का समय निकट आता है, तब नंदा देवी के मायके क्षेत्र में चौसिंग्या खाडू का जन्म शुभ संकेत माना जाता है। इसे देवी का दूत, अग्रदूत या देव-रथ कहा जाता है।

यात्रा शुरू होने से पहले विशेष पूजा-अर्चना के साथ इसकी पीठ पर एक पोटली बाँधी जाती है। इस पोटली में देवी के लिए भेंट, श्रृंगार सामग्री और श्रद्धालुओं की अर्पित वस्तुएँ रखी जाती हैं। इसके बाद चौसिंग्या खाडू पूरी यात्रा के दौरान आगे-आगे चलता है और देवी की डोली उसके पीछे बढ़ती है।

जब यात्रा अपने अंतिम पड़ाव होमकुंड पहुँचती है, तब एक अत्यंत भावुक अनुष्ठान होता है। पूजा के बाद चौसिंग्या खाडू को स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है। स्थानीय विश्वास है कि वह देवी का संदेश लेकर कैलाश की ओर प्रस्थान करता है। लोककथाएँ कहती हैं कि इसके बाद वह हिमालय की ऊँचाइयों में कहीं विलीन हो जाता है और फिर कभी दिखाई नहीं देता।

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ श्रद्धालु इसे दैवीय संकेत मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक इसे एक दुर्लभ आनुवंशिक विशेषता के रूप में देखते हैं। चार सींगों वाले मेढ़ों का जन्म अत्यंत कम होता है, इसलिए हर बार ऐसे मेढ़े के जन्म की खबर पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन जाती है।

शायद यही कारण है कि चौसिंग्या खाडू केवल एक पशु नहीं रह जाता। वह राजजात की आत्मा का हिस्सा बन जाता है–एक ऐसा जीव, जो देवी की विदाई, लोकविश्वास और हिमालय की रहस्यमयी परंपराओं को एक साथ जोड़ता है।

राजजात की कथा में एक और पात्र है, जिसके बिना नंदा देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। वह हैं लाटू देवता।

वाण गाँव स्थित लाटू देवता मंदिर

उत्तराखंड की लोकपरंपरा में लाटू देवता को नंदा देवी का धर्मभाई माना जाता है। वाण गाँव स्थित उनका मंदिर राजजात मार्ग के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। लोकविश्वास है कि कैलाश की ओर प्रस्थान करने से पहले नंदा देवी अपने धर्मभाई से मिलने अवश्य आती हैं। यही कारण है कि राजजात के दौरान वाण गाँव का पड़ाव विशेष महत्व रखता है।

लाटू देवता का मंदिर अपनी परंपराओं के कारण भी अनोखा माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश सामान्य श्रद्धालुओं के लिए प्रतिबंधित रहता है। विशेष अवसरों पर जब मंदिर के भीतर पूजा की जाती है, तब पुजारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँधते हैं और कई परंपराओं में मुख ढकने का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यता है कि देवता की शक्ति इतनी प्रबल है कि उनकी प्रत्यक्ष दृष्टि सामान्य मनुष्य के लिए संभव नहीं है।

लोककथाओं के अनुसार लाटू देवता नंदा देवी की रक्षा और मार्गदर्शन का दायित्व निभाते हैं। कुछ परंपराएँ उन्हें देवी के सेनापति के रूप में याद करती हैं, जबकि कुछ उन्हें धर्मभाई के रूप में। यह विविधता स्वयं बताती है कि लाटू देवता का स्वरूप केवल एक धार्मिक पात्र का नहीं, बल्कि हिमालयी लोकविश्वासों के लंबे विकास का परिणाम है।

राजजात में नंदा देवी की विदाई जितनी भावनात्मक है, उतना ही महत्वपूर्ण वह क्षण भी माना जाता है जब देवी अपने धर्मभाई के क्षेत्र से आगे बढ़ती हैं। लोकमान्यता में इसके बाद यात्रा अधिक कठिन, अधिक पवित्र और अधिक हिमालयी हो जाती है। मानो गाँवों की दुनिया पीछे छूट रही हो और देवी धीरे-धीरे कैलाश की ओर लौट रही हों।

यही कारण है कि नंदा देवी राजजात को समझने के लिए केवल नंदा देवी को समझना पर्याप्त नहीं है। लाटू देवता, चौसिंग्या खाडू, नौटी, कांसुवा, वाण और होमकुंड – ये सभी मिलकर उस सांस्कृतिक ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं जिसे आज हम नंदा देवी राजजात के नाम से जानते हैं।

नंदा देवी राजजात का मार्ग भी अपने भीतर एक सांस्कृतिक भूगोल समेटे हुए है।

हिमालयी मार्ग पर आगे बढ़ती नंदा देवी राजजात डोली

नौटी, कांसुवा, सेम, कोटी, भगोटी, कुलसारी, नंदकेशरी, वाण, बेदनी बुग्याल, पातर नचौणिया, रूपकुंड, शिला समुद्र और होमकुंड जैसे पड़ाव केवल रास्ते के नाम नहीं हैं। ये वे स्थान हैं जहाँ लोककथाएँ, स्मृतियाँ और धार्मिक अर्थ पीढ़ियों से जमा होते रहे हैं।
जैसे-जैसे यात्रा ऊँचाई की ओर बढ़ती है, उसका स्वर भी बदलता जाता है।

गाँवों की भीड़, ढोल-दमाऊँ और लोकगीतों से शुरू हुई यात्रा धीरे-धीरे बुग्यालों की खुली नीरवता में प्रवेश करती है। बेदनी बुग्याल के बाद रास्ता अधिक कठिन हो जाता है। रूपकुंड और उससे आगे का क्षेत्र हिमालय की कठोरता का अनुभव कराता है। होमकुंड पहुँचते-पहुँचते यात्रा केवल सामूहिक उत्सव नहीं रहती, वह तप, श्रम और आस्था की परीक्षा बन जाती है।

राजजात की गहराई को समझने के लिए William S. Sax जैसे शोधकर्ताओं का काम महत्वपूर्ण है। William ने नंदा देवी की परंपरा को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि हिमालयी समाज में लिंग, निवास, राजनीति और लोकदेवता की भूमिका से जोड़कर देखा। उनके अध्ययन का महत्वपूर्ण संकेत यह है कि नंदा देवी की लोकप्रियता इसलिए भी गहरी है क्योंकि उनकी कथा पहाड़ की स्त्रियों के जीवन से मिलती है।

एक लड़की अपने मायके से ससुराल जाती है। वह अपने घर, अपनी माँ, अपने गाँव और अपने पहाड़ को छोड़ती है। लोकगीतों में उसका दुख, प्रेम और विदाई बार-बार लौटते हैं। नंदा देवी की यात्रा इसी स्त्री-अनुभव का दैवी रूप बन जाती है।

यही कारण है कि राजजात में देवी की विदाई केवल धार्मिक कल्पना नहीं लगती। वह पहाड़ के सामाजिक जीवन का विस्तार लगती है।

इस यात्रा में स्त्रियों की उपस्थिति विशेष अर्थ रखती है। भले ही कठिन उच्च हिमालयी मार्गों पर सभी लोग अंत तक न जा पाते हों, लेकिन नंदा के गीत, विदाई, स्मरण और अनुष्ठान में स्त्री-भावना इस परंपरा का केंद्र बन जाती है। नंदा की कथा में बेटी का दर्द है, माँ का स्नेह है, गाँव की स्मृति है और उस समाज की संरचना है जहाँ विवाह केवल पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि भावनात्मक विस्थापन भी होता है।
राजजात इसी विस्थापन को पवित्र अर्थ देती है।

इतिहास के स्तर पर इस यात्रा को गढ़वाल की राजपरंपरा से भी जोड़ा जाता है। कई विवरण इसे प्राचीन राजवंशों, कांसुवा के कुँवरों और नौटी की पुरोहित परंपरा से संबंधित बताते हैं। इसलिए “राजजात” शब्द में “राज” केवल भव्यता का संकेत नहीं है। यह उस ऐतिहासिक संरचना की ओर भी इशारा करता है जिसमें राजा, पुरोहित, ग्राम-समुदाय और लोकदेवता एक धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा बनते थे।
फिर भी इस यात्रा की सबसे बड़ी शक्ति उसका लोकस्वर है।

गाँवों से गुजरती नंदा देवी राजजात की पारंपरिक यात्रा

राजजात में केवल एक देवी की डोली नहीं चलती। मार्ग में अनेक स्थानीय देवताओं की डोलियाँ और निशान भी जुड़ते हैं। गाँव अपनी स्मृति के साथ यात्रा में शामिल होते हैं। कहीं गीत गाए जाते हैं, कहीं पूजा होती है, कहीं देवी को बेटी की तरह रोका जाता है, कहीं उसे विदा किया जाता है।

इस तरह राजजात एक चलती हुई लोक-संस्कृति बन जाती है।

यह यात्रा उत्तराखंड के भूगोल को भी धार्मिक अर्थ देती है। बुग्याल केवल घास के मैदान नहीं रहते। कुंड केवल जलाशय नहीं रहते। दर्रे केवल पहाड़ी रास्ते नहीं रहते। वे देवी की यात्रा के पड़ाव बन जाते हैं। इससे हिमालय का भौतिक भूगोल सांस्कृतिक भूगोल में बदल जाता है।

आज के समय में नंदा देवी राजजात के सामने नई चुनौतियाँ भी हैं।

ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में मौसम की अनिश्चितता, भूस्खलन, ग्लेशियर क्षेत्र की संवेदनशीलता, भीड़ प्रबंधन, संचार व्यवस्था, चिकित्सा सुविधा और पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। हाल के वर्षों में राजजात को लेकर प्रशासनिक तैयारी, डिजिटल ट्रैकिंग, मार्ग-सुरक्षा और पर्यावरणीय सावधानियों पर भी चर्चा बढ़ी है।

इससे स्पष्ट है कि राजजात अब केवल परंपरा का विषय नहीं रही। यह विरासत, आपदा-प्रबंधन, सतत पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रश्न बन चुकी है।

लेकिन इन आधुनिक चुनौतियों के बीच भी इस यात्रा की आत्मा वही है।

नंदा अब भी बेटी है।

नौटी अब भी मायका है।

कैलाश अब भी ससुराल है।

और हिमालय अब भी उस विदाई का साक्षी है, जिसे लोग बारह वर्षों तक स्मृति में सँभालकर रखते हैं।

नंदा देवी राजजात इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह कितने किलोमीटर लंबी है। वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसमें उत्तराखंड का समाज अपने को पहचानता है।

उसमें लोकगीत हैं, देवडोलियाँ हैं, राजवंशीय स्मृति है, स्त्री-अनुभव है, कठिन हिमालयी भूगोल है और वह भाव है जिसे केवल “तीर्थयात्रा” कहकर नहीं समझा जा सकता।

यह यात्रा बताती है कि पहाड़ में देवता केवल मंदिरों में नहीं रहते।

वे रास्तों में चलते हैं।

गाँवों से गुजरते हैं।

गीतों में रोते हैं।

और कभी-कभी बेटी बनकर विदा भी होते हैं।