आज यदि किसी पहाड़ी शादी में ढोल-दमाऊँ के साथ गढ़वाली गीत बजते हैं, यदि किसी बस में सफर करते हुए कोई युवक अपने मोबाइल पर गढ़वाली गीत सुन रहा है, यदि उत्तराखंड से हजारों किलोमीटर दूर बैठे प्रवासी पहाड़ी अपने गाँव की याद किसी लोकधुन में तलाश लेते हैं, तो यह सब इतना स्वाभाविक लगता है कि हम कभी रुककर यह सोचते ही नहीं कि यह सब शुरू कहाँ से हुआ था।
हर परंपरा की तरह इसकी भी एक शुरुआत थी।
एक समय ऐसा था जब गढ़वाली भाषा पहाड़ के गाँवों, खेतों, चौपालों और मेलों में तो गूँजती थी, लेकिन उसके पास कोई रिकॉर्ड नहीं था। वह लोगों की स्मृति में रहती थी। एक पीढ़ी गाती थी, दूसरी सुनती थी और फिर वही गीत आगे बढ़ जाते थे। यदि कोई गीत खो जाता, तो उसके साथ उसका एक संसार भी खो जाता।
शायद इसलिए जीत सिंह नेगी का महत्व केवल एक गायक के रूप में नहीं समझा जा सकता।
वे उस पीढ़ी के व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार यह महसूस किया कि लोकसंगीत केवल गाया ही नहीं जाना चाहिए, उसे बचाया भी जाना चाहिए।
जब देश स्वतंत्रता के बाद एक नए दौर में प्रवेश कर रहा था, तब पहाड़ भी बदल रहा था। लोग रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों की ओर जा रहे थे। घर छूट रहे थे, गाँव पीछे रह रहे थे, लेकिन स्मृतियाँ साथ चल रही थीं। उन्हीं स्मृतियों के बीच जीत सिंह नेगी की आवाज़ उभरी।
1949 में उनके गढ़वाली गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड जारी हुआ। यह केवल एक रिकॉर्ड नहीं था। यह पहली बार था जब पहाड़ की बोली, उसकी संवेदनाएँ और उसका लोकजीवन ध्वनि के रूप में संरक्षित हो रहा था। आज यह बात साधारण लग सकती है, लेकिन उस समय यह सांस्कृतिक इतिहास की एक बड़ी घटना थी।
जीत सिंह नेगी केवल गायक नहीं थे। वे लेखक थे, संगीतकार थे, नाटककार थे और लोकसंस्कृति के ऐसे साधक थे जिन्हें यह चिंता थी कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में पहाड़ अपनी आवाज़ न खो दे। उन्होंने लोकधुनों को केवल दोहराया नहीं, उन्हें संजोया। पुराने गीतों, वाद्ययंत्रों और लोकशैलियों को संरक्षित करने का प्रयास किया।
उनकी रचनाओं में पहाड़ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं था। वह एक जीवित संसार था। वहाँ की स्त्रियाँ थीं, खेत थे, मेले थे, बिछोह था, प्रवास था और वह भावनात्मक भूगोल था जिसे केवल वही समझ सकता है जिसने कभी अपना गाँव छोड़ा हो।
शायद यही कारण है कि जीत सिंह नेगी को सुनना केवल गीत सुनना नहीं है। यह उस उत्तराखंड से मिलना है जो सड़कों, मोबाइल नेटवर्क और सोशल मीडिया से पहले का था। वह उत्तराखंड जहाँ खबरें पैदल चलती थीं, जहाँ गीत स्मृतियों में रहते थे और जहाँ संस्कृति किसी सरकारी दस्तावेज़ से नहीं, लोगों के कंठ से बची रहती थी।
जीत सिंह नेगी की रचनाओं का प्रभाव केवल उनके अपने समय तक सीमित नहीं रहा। उनकी कई लोकप्रिय रचनाएँ बाद की पीढ़ियों तक पहुँचीं और नए स्वरों में जीवित रहीं। इसका सबसे चर्चित उदाहरण “तू होली बीरा” एल्बम है, जिसे Narendra Singh Negi ने अपनी आवाज़ दी। बहुत से श्रोता इन गीतों को नरेंद्र सिंह नेगी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि इस एल्बम के गीत मूल रूप से जीत सिंह नेगी की रचनाएँ थीं। नरेंद्र सिंह नेगी ने स्वयं उनकी अनुमति और सहमति के बाद इन गीतों को गाया और नई पीढ़ी तक पहुँचाया। इस तरह यह केवल एक एल्बम नहीं था, बल्कि गढ़वाली संगीत की दो पीढ़ियों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु भी था—जहाँ एक लोकपुरोधा की रचनाएँ दूसरे लोकनायक की आवाज़ के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचीं।
समय बदल गया। रिकॉर्ड की जगह कैसेट ने ली, कैसेट की जगह सीडी ने और फिर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म आ गए। नई पीढ़ियाँ आईं। नए गायक आए। लेकिन इतिहास में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका महत्व उनकी लोकप्रियता से नहीं, उनकी शुरुआत से तय होता है।
गढ़वाली संगीत के इतिहास में जीत सिंह नेगी ऐसे ही व्यक्ति हैं।
क्योंकि हर नदी का एक उद्गम होता है।
और आधुनिक गढ़वाली संगीत की उस नदी के उद्गम पर यदि किसी एक व्यक्ति की छाया सबसे स्पष्ट दिखाई देती है, तो वह जीत सिंह नेगी हैं।




