उत्तरकाशी। उत्तराखंड के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में लगातार बढ़ रहे भू-क्षरण और भू-धंसाव ने चिंता बढ़ा दी है। कभी मखमली घास से ढके रहने वाले इस उच्च हिमालयी घास मैदान के कई हिस्सों में अब गहरी खाइयां बनती जा रही हैं। इससे करीब 400 हेक्टेयर क्षेत्र पर खतरा मंडरा रहा है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2012-13 की आपदा के बाद से इस क्षेत्र में भू-धंसाव का खतरा बना हुआ था। हालांकि, पिछले दो-तीन वर्षों में धियाणा बुग्याल के समीप नहेटा और चिलपाड़ा क्षेत्र में भू-क्षरण तेजी से बढ़ा है। यहां कई जगह जमीन कटकर खाइयों का रूप लेने लगी है।
दयारा बुग्याल समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। पिछले कुछ वर्षों में इसके निचले इलाकों धियाणा, बरनाला, गोई, नहेटा और चिलपाड़ा में भू-धंसाव की घटनाएं बढ़ी हैं। इससे न केवल घास के मैदानों का स्वरूप बदल रहा है, बल्कि बुग्याल की जैव विविधता पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इन क्षेत्रों से निकलने वाला मलबा हर साल पापड़गाड में आपदा जैसी स्थिति पैदा कर रहा है। नहेटा क्षेत्र के घने जंगलों में भी भू-धंसाव और भूस्खलन के कारण वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है। दयारा बुग्याल ट्रैक के मुख्य पड़ाव धियाणा, बरनाला और गोई जैसे तोकों के घास मैदानों में भी कई स्थानों पर बड़ी खाइयां बन चुकी हैं।
वन विभाग ने वर्ष 2020 में भारतीय वन्यजीव संस्थान और उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के सहयोग से ईको-फ्रेंडली तरीके से भू-क्षरण रोकने का काम किया था। उस दौरान करीब 600 मीटर क्षेत्र में जूट और नारियल के रेशों से बने नेट के साथ पिरूल के चेक डैम बनाकर क्षरण रोकने की कोशिश की गई थी। यह प्रयोग संबंधित क्षेत्र में सफल भी रहा था।
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हालांकि, वर्ष 2024 और 2025 में नहेटा और चिलपाड़ा सहित अन्य हिस्सों में भू-धंसाव और भूस्खलन तेजी से देखने को मिला। लगातार कट रही मिट्टी पापड़गाड नदी में बह रही है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में खतरा बढ़ने की बात स्थानीय लोग कह रहे हैं।
क्यारक के पूर्व प्रधान विपिन राणा का कहना है कि बुग्याल क्षेत्र में हो रहे भू-धंसाव का असर रैथल और क्यारक गांवों सहित गंगोत्री हाईवे तक दिखाई दे रहा है। कई संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की बात भी सामने आई है। बार्सू प्रधान दीपा रावत ने भी बरनाला क्षेत्र में भू-धंसाव और भूस्खलन तेजी से बढ़ने की बात कही है।
उत्तरकाशी वन प्रभाग के डीएफओ डीपी बलूनी के अनुसार, वन विभाग बुग्याल संरक्षण के लिए जूट नेट आदि के माध्यम से लगातार कार्य कर रहा है। पूर्व में किए गए सुरक्षात्मक कार्य सफल रहे थे। इसी तर्ज पर अब भारतीय वन्यजीव संस्थान और विशेषज्ञों के साथ मिलकर दयारा बुग्याल के संरक्षण के लिए विस्तृत योजना तैयार की जा रही है।
दयारा बुग्याल उत्तराखंड के प्रमुख उच्च हिमालयी घास मैदानों में गिना जाता है और ट्रेकिंग व पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में भू-क्षरण और भू-धंसाव की बढ़ती स्थिति पर्यावरण, पर्यटन और स्थानीय आबादी, तीनों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
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