1999 के कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 जवानों ने दिया था बलिदान, 37 को मिले वीरता पुरस्कार

उत्तराखंड के गांवों और सैन्य परिवारों के लिए कारगिल युद्ध केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि आज भी जीवित स्मृतियों का हिस्सा है। 75 जवानों के सर्वोच्च बलिदान और 37 वीरता पुरस्कारों के पीछे ऐसी कई कहानियां हैं, जिन्होंने प्रदेश की सैन्य परंपरा और देशसेवा की पहचान को नई ऊंचाई दी। इन्हीं घटनाओं और वीरों के योगदान को यह लेख विस्तार से सामने लाता है।
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान एक रणनीतिक पहाड़ी चोटी पर तैनात भारतीय सेना के जवान और शीर्ष पर लहराता तिरंगा।

मई 1999 का समय था। कारगिल और द्रास की ऊंची चोटियों पर बर्फ जमी हुई थी और नीचे श्रीनगर से लेह को जोड़ने वाले रास्ते पर सेना की आवाजाही सामान्य दिनों की तरह चल रही थी। इसी बीच पता चला कि पाकिस्तानी सैनिक और घुसपैठिए नियंत्रण रेखा पार कर कई महत्वपूर्ण चोटियों पर अपने ठिकाने बना चुके हैं।

दुश्मन पहाड़ों के ऊपर बैठा था और भारतीय जवान नीचे थे। उसके पास ऊंचाई का फायदा था। भारतीय सैनिकों को बर्फ, खड़ी चट्टानों और दुश्मन की गोलीबारी के बीच ऊपर चढ़ना था। कई जगह जवानों को रात के अंधेरे में आगे बढ़ना पड़ा, ताकि दुश्मन उनकी हलचल न देख सके। इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच भारतीय सेना ने कब्जाई गई चोटियों को वापस लेने के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया।

कारगिल युद्ध में आज के उत्तराखंड क्षेत्र के जवानों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय उत्तराखंड अलग राज्य नहीं था और यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। इस युद्ध में वर्तमान उत्तराखंड क्षेत्र के 75 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जबकि 37 जवानों को उनकी वीरता के लिए अलग-अलग वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

गढ़वाल और कुमाऊं के गांवों में उन दिनों हर परिवार की नजर रेडियो और अखबारों से आने वाली खबरों पर टिकी रहती थी। किसी का बेटा कारगिल में तैनात था, किसी का भाई कई दिनों से घर बात नहीं कर पाया था और किसी परिवार को केवल इतना पता था कि उनका अपना जवान युद्ध क्षेत्र में है। सेना की जीत की खबरें लोगों को गर्व से भर देती थीं, लेकिन कई घरों तक ऐसी खबरें भी पहुंचीं, जिनके बाद वहां हमेशा के लिए एक खालीपन रह गया।

कारगिल युद्ध में उत्तराखंड से जुड़े मेजर विवेक गुप्ता की वीरता को आज भी याद किया जाता है। वह 2 राजपूताना राइफल्स में तैनात थे। 12 और 13 जून 1999 की रात उनकी टुकड़ी को तोलोलिंग पर दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की जिम्मेदारी मिली थी। रास्ता बेहद कठिन था और ऊपर से लगातार गोलीबारी हो रही थी।

लड़ाई के दौरान मेजर विवेक गुप्ता घायल हो गए, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ना नहीं छोड़ा। उन्होंने दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकाने पर हमला किया और अपने साथियों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। इसी संघर्ष में उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

तोलोलिंग की लड़ाई में नैनीताल के तल्लीताल निवासी मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने भी असाधारण साहस दिखाया। वह 18 ग्रेनेडियर्स में तैनात थे। दुश्मन के ठिकानों की ओर बढ़ते समय वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। घायल अवस्था में भी उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व जारी रखा और दुश्मन के दूसरे ठिकाने पर हमला कर उसे कब्जे में लिया।

मेजर राजेश सिंह अधिकारी की इस कार्रवाई से भारतीय सेना को आगे बढ़ने और प्वाइंट 4590 पर नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिली। उन्होंने भी युद्ध में सर्वोच्च बलिदान दिया और उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया।

करीब दो महीने तक चले युद्ध में भारतीय सेना ने तोलोलिंग, टाइगर हिल और दूसरी महत्वपूर्ण चोटियों पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया। 26 जुलाई 1999 को ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की गई। इसी जीत की याद में हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।

उत्तराखंड के जिन गांवों से ये जवान सेना में गए थे, वहां आज भी उनकी यादें संभालकर रखी गई हैं। कहीं घर की दीवार पर उनकी वर्दी वाली तस्वीर लगी है, कहीं उनके नाम का स्मारक बनाया गया है और कहीं परिवार ने उनके पत्र और सामान आज भी सुरक्षित रखे हैं।

कारगिल विजय दिवस केवल युद्ध में मिली जीत को याद करने का दिन नहीं है। यह उन जवानों को नमन करने का भी दिन है, जो बर्फीली चोटियों पर देश के लिए लड़ते हुए घर नहीं लौट सके। उत्तराखंड के उन 75 जवानों का बलिदान आज भी प्रदेश के गांवों और सैन्य परिवारों में गर्व और सम्मान के साथ याद किया जाता है।