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सड़क किनारे नंदी की प्रतिमा के पास खड़ा एक कमजोर वास्तविक पशु, जबकि लोग प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

हम पत्थरों को नहीं, शायद अपनी कल्पनाओं को पूजते हैं

कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम वास्तविक चीज़ों से अधिक उनके प्रतीकों से जुड़ जाते हैं। शायद समस्या प्रतीकों में नहीं, बल्कि उस दूरी में है जो धीरे-धीरे उनके अर्थ और वास्तविक जीवन के बीच पैदा हो जाती है। और तब हम उन चीज़ों को बचाए रखते हैं जिन्हें देखा जा सकता है, जबकि उन भावनाओं को खो देते हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। इस लेख में इसी विरोधाभास पर एक चिंतन।

तिलाड़ी कांड के शहीदों की स्मृति में बना स्मारक पत्थर

तिलाड़ी कांड: क्यों कहा जाता है इसे उत्तराखंड का ‘जलियाँवाला बाग’?

तिलाड़ी कांड को अक्सर “उत्तराखंड का जलियाँवाला बाग” क्यों कहा जाता है? यह तुलना केवल निहत्थे लोगों पर हुई गोलीबारी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वन अधिकारों, आजीविका, जनसंघर्ष और रियासती शासन के खिलाफ उभरते असंतोष की एक लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। आखिर रवाई आंदोलन और तिलाड़ी की घटना ने उत्तराखंड की जनचेतना को किस तरह प्रभावित किया और यह स्मृति आज भी इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है?

जीत सिंह नेगी एक ग्रामोफोन रिकॉर्ड हाथ में लिए सांस्कृतिक वस्तुओं के बीच दिखाई देते हुए।

जीत सिंह नेगी: जिनके बिना गढ़वाली संगीत का इतिहास अधूरा है

आज गढ़वाली गीतों को सुनना जितना सहज लगता है, उतना ही आसान यह मान लेना भी है कि यह परंपरा हमेशा से इसी रूप में मौजूद रही होगी। लेकिन एक समय ऐसा था जब लोकगीत केवल लोगों की स्मृतियों में जीवित रहते थे। गढ़वाली संगीत को रिकॉर्डेड पहचान देने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की इस यात्रा में जीत सिंह नेगी की भूमिका क्यों इतनी महत्वपूर्ण मानी जाती है? इस लेख में इसी सांस्कृतिक विरासत की कहानी।

पारंपरिक गढ़वाली गांव में चर्चा के दौरान अन्य लोगों की बात ध्यान से सुनता एक बुजुर्ग ग्रामीण।

जिस समाज में हर कोई बोल रहा है, वहाँ सुन कौन रहा है?

हम बातचीत नहीं करते, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। हम सुनते नहीं, उत्तर तैयार करते हैं। शायद हमारे समय की बहुत-सी समस्याएँ विचारों की कमी से नहीं, सुनने की कमी से पैदा हुई हैं। और जब सुनना कम होने लगता है, तो संवाद धीरे-धीरे प्रतिध्वनि में बदल जाता है। इस लेख में इसी प्रश्न पर एक विचार।

गढ़वाल के एक गांव में स्थित पारंपरिक पत्थर और मिट्टी का घर, जिसके बाहर रोजमर्रा की उपयोग की वस्तुएं दिखाई दे रही हैं।

पहाड़ छोड़ने वाले लोग पहाड़ को सबसे ज़्यादा क्यों याद करते हैं?

शहर में बस जाने के वर्षों बाद अचानक किसी बरसाती शाम में मिट्टी की गंध के साथ गाँव याद आ जाता है। किसी पहाड़ी शब्द, किसी त्योहार या किसी पुराने रास्ते की स्मृति मन को वहीं ले जाती है जहाँ से जीवन की शुरुआत हुई थी। शायद हम हमेशा जगहों को नहीं, अपने भीतर छूटे हुए हिस्सों को याद करते हैं। इस लेख में इसी अनुभव पर एक विचार।

पहाड़ी क्षेत्र में बीमार व्यक्ति को स्ट्रेचर के सहारे अस्पताल तक ले जाते ग्रामीण

पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों का अभाव: एक मौन संकट

पहाड़ में कई बार सबसे बड़ी चिंता बीमारी नहीं, बल्कि सही समय पर मदद तक पहुंच होती है। इस लेख के माध्यम से उन चुनौतियों, स्थानीय वास्तविकताओं और रोजमर्रा के संघर्ष को समझने की कोशिश की गई है, जो दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लोगों के जीवन से सीधे जोड़ती हैं।

पहाड़ी गांव में अपने घर के बाहर बैठा भविष्य को लेकर सोचता एक युवा

दो दुनियाओं के बीच जीता पहाड़ी युवा

कई बार लौटना चाहने के बावजूद रास्ते आसान नहीं होते, और कई बार जाने के बाद भी पहाड़ पूरी तरह पीछे नहीं छूटता। इस लेख के माध्यम से उस भावनात्मक, सामाजिक और व्यावहारिक खींचतान को समझने की कोशिश की गई है, जिसके बीच आज का पहाड़ी युवा अपना भविष्य तलाश रहा है।

उत्तराखंड के बाँज जंगल में पत्तियों और मिट्टी के बीच जल संरक्षण का प्राकृतिक वातावरण

बाँज के जंगल और पहाड़ी जलस्रोत: पर्यावरण का चक्र

पहाड़ में कई गाँव कभी धारा देखकर बसे थे। लेकिन क्या सच में बाँज के जंगल और पानी का रिश्ता उतना गहरा है, जितना पुराने लोग मानते रहे हैं? विज्ञान, अनुभव और पहाड़ की जमीन क्या कहती है, जानिए।

उत्तराखंड में तिमला (Ficus auriculata) के पेड़ पर उगते फल

तिमला: पहाड़ का वह फल जो प्रकृति के सबसे अनोखे रहस्यों में से एक है

क्या सच में तिमला वह फल नहीं है, जैसा हम बचपन से समझते आए हैं? पहाड़ों में मिलने वाले इस आम दिखने वाले लाल फल के भीतर प्रकृति का ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे जानने के बाद शायद आप अगली बार तिमला देखकर रुक जाएँ।

उत्तराखंड के पहाड़ी खेतों में उगती चौलाई की फसल

चौलाई: पहाड़ की वह फसल जो आज विदेशों में ‘सुपरफूड’ के नाम से बिक रही है

क्या सच में पहाड़ों के खेतों में उगने वाली एक साधारण फसल को दुनिया आज ‘सुपरफूड’ मान रही है? आखिर क्यों चौलाई, जिसे हिमालय के लोग पीढ़ियों से खाते आए हैं, अब विदेशों के महंगे सुपरमार्केट तक पहुँच चुकी है? यह लेख चौलाई की पोषण क्षमता, इतिहास और पहाड़ से उसके गहरे संबंध के बारे में है।