
हम पत्थरों को नहीं, शायद अपनी कल्पनाओं को पूजते हैं
कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम वास्तविक चीज़ों से अधिक उनके प्रतीकों से जुड़ जाते हैं। शायद समस्या प्रतीकों में नहीं, बल्कि उस दूरी में है जो धीरे-धीरे उनके अर्थ और वास्तविक जीवन के बीच पैदा हो जाती है। और तब हम उन चीज़ों को बचाए रखते हैं जिन्हें देखा जा सकता है, जबकि उन भावनाओं को खो देते हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। इस लेख में इसी विरोधाभास पर एक चिंतन।








