सुबह सूरज से नहीं, मां से शुरू होती है

मां का प्यार अक्सर बड़े शब्दों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखाई देता है। यह लेख उसी अनकहे स्नेह, त्याग और उस खालीपन की कहानी है, जिसे केवल वही समझ सकता है जिसने मां का साथ महसूस किया हो। आगे पढ़िए...
Representative image of an Indian mother preparing breakfast in the kitchen early in the morning before the family wakes up.

सुबह के करीब पांच बजे हैं। बाहर अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ। घर के बाकी लोग सो रहे हैं, लेकिन रसोई में बर्तन रखने की हल्की-सी आवाज आने लगी है। चाय चढ़ चुकी है, आटा गूंथा जा रहा है और मां एक बार फिर सबके जागने से पहले दिन को तैयार करने में लगी है।

मैं कई बार सोचता हूं, हमारे घर की सुबह सूरज से नहीं, मां से शुरू होती थी। हम उठते थे तो कपड़े तैयार मिलते थे, खाना बन चुका होता था और हर चीज अपनी जगह पर होती थी। तब लगता था कि यह सब अपने आप हो जाता है। बहुत बाद में समझ आया कि इसके पीछे कोई था, जो रोज हमसे पहले उठता था और सबसे बाद में सोता था।

जब मैं मां के बारे में सोचता हूं, तो सबसे पहले कोई बड़ी घटना याद नहीं आती। मुझे उसकी छोटी-छोटी बातें याद आती हैं। सुबह सबसे पहले उठना, सबके लिए चाय बनाना, घर का काम देखना और फिर भी ऐसे रहना जैसे उसने कुछ किया ही नहीं।

बचपन में हमें लगता था कि मां कभी थकती नहीं। उसे भूख भी शायद कम लगती है, नींद भी कम आती है और उसकी अपनी कोई जरूरत भी नहीं होती। बाद में समझ आया कि ऐसा कुछ नहीं था। वह भी थकती थी, उसे भी आराम चाहिए होता था, उसकी भी इच्छाएं रही होंगी। फर्क बस इतना था कि उसने हमेशा हमें अपने से पहले रखा।

मां का प्यार भी शायद इसी तरह होता है—बहुत साधारण दिखने वाला, लेकिन भीतर से बहुत गहरा। वह हर बार “मैं तुमसे प्यार करती हूं” नहीं कहती, लेकिन हमारे देर से घर लौटने पर दरवाजे की तरफ उसकी नजर लगी रहती है। हम बीमार पड़ जाएं तो पूरी रात जागती है, और हम ठीक हो जाएं तो ऐसे मुस्कुराती है जैसे उसकी अपनी बीमारी उतर गई हो।

कई बार उसका प्यार डांट के रूप में मिलता है, कभी बार-बार खाना पूछने में और कभी बिना कहे हमारी पसंद की चीज बना देने में। बचपन में यह सब सामान्य लगता था। अब समझ आता है कि दुनिया में बहुत लोग हमारा ख्याल रख सकते हैं, लेकिन मां जैसा कोई नहीं रखता। उसे हमारी जरूरतों का पता हमारे बताने से पहले चल जाता है।

मां जितना प्यार करती है, उतनी ही डांट भी लगाती है। बच्चे से गलती हो जाए तो पहले उसकी आवाज पूरे घर में गूंजती है, और बात ज्यादा बढ़ जाए तो कभी चप्पल तो कभी बेलन भी हाथ में आ जाता है।

उस समय बच्चे को लगता है कि मां से ज्यादा सख्त कोई नहीं। लेकिन थोड़ी देर बाद वही मां पूछती है कि खाना खाया या नहीं, चोट लगी हो तो मरहम लगाती है और रात तक अपना सारा गुस्सा भूल जाती है। उसकी डांट में नाराजगी जरूर होती है, लेकिन उसके पीछे चिंता यही रहती है कि उसका बच्चा कहीं गलत रास्ते पर न चला जाए।

लेकिन हर बच्चे को मां का साथ उम्रभर नहीं मिलता। किसी की मां बचपन में ही चली जाती है, तो कोई उसे अपनी जवानी में खो देता है। उम्र कोई भी हो, मां के जाने के बाद घर वही रहता है, लोग वही रहते हैं, लेकिन एक खालीपन हमेशा के लिए बस जाता है।

फिर किसी दिन उसकी डांट याद आती है, किसी दिन उसकी आवाज, और किसी दिन सिर्फ इतना कि वह होती तो शायद सब थोड़ा आसान होता।

और जिनकी मां नहीं होती, उसके न होने का खालीपन सिर्फ वही समझ सकते हैं। बाहर से जिंदगी सामान्य दिखती है, लोग साथ होते हैं, घर भी चलता रहता है, लेकिन भीतर कहीं एक जगह हमेशा खाली रह जाती है। मां की आवाज, उसकी डांट, उसका इंतजार और बिना कहे समझ लेना—इन सबकी कमी शब्दों में पूरी तरह बताई नहीं जा सकती।

मां हर किसी के पास नहीं होती, और जिनके पास होती है, वे सच में भाग्यशाली होते हैं। उसकी मौजूदगी कई बार इतनी सामान्य लगती है कि लोग उसकी कीमत समझ ही नहीं पाते। लेकिन जिस दिन वह साथ नहीं रहती, तब महसूस होता है कि घर में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं गया, बल्कि वह सुकून चला गया जो बिना कुछ कहे सब संभाल लेता था।