जंगलों के बिना कैसा कल?

जंगलों की असली कीमत लकड़ी से नहीं, बल्कि उन अनदेखे रिश्तों से तय होती है जो पानी, मिट्टी, वन्यजीव और इंसानी जीवन को जोड़ते हैं। इस लेख के माध्यम से समझिए कि जंगलों का सवाल आखिर भविष्य का सवाल क्यों बनता जा रहा है।
A Himalayan landscape in Uttarakhand showing a dense forest alongside road construction and hillside development, illustrating the balance between nature and infrastructure.

एक बात कई दिनों से मन में घूम रही थी। आखिर जंगल खत्म कैसे होते हैं?

पहले तो लगा कि इसका जवाब बिल्कुल सीधा होगा। पेड़ काट दिए जाते होंगे और जंगल खत्म हो जाता होगा। लेकिन फिर ध्यान आया कि अगर बात इतनी ही सरल होती, तो दुनिया में जंगल बचाने के लिए वैज्ञानिक, वन अधिकारी, पर्यावरणविद् और अदालतें इतनी चिंता क्यों करतीं? एक पेड़ कटने और एक जंगल खत्म होने के बीच शायद उतना ही अंतर है, जितना किसी इंसान के बाल कटने और उसके अस्तित्व के खत्म हो जाने में।

फिर सवाल आया कि क्या जंगल केवल वहीं होता है, जहाँ बहुत सारे पेड़ एक साथ खड़े हों?

शायद नहीं।

अगर केवल पेड़ों का एक झुंड ही जंगल होता, तो किसी शहर के बड़े पार्क को भी जंगल कहा जाता। लेकिन ऐसा नहीं होता। वहाँ पेड़ होते हैं, छाया होती है, लोग घूमते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं। फिर भी वह जंगल नहीं होता।

तो फिर जंगल आखिर है क्या?

जितना पढ़ा, उतना समझ आया कि जंगल दरअसल उन रिश्तों का नाम है, जिन्हें हम देख नहीं पाते। एक पेड़ की जड़ के पास रहने वाला कवक, उसी पेड़ पर घोंसला बनाता पक्षी, उसी की छाल में पलते कीट, उन्हीं कीड़ों को खाने वाले दूसरे जीव, पत्तों से बनती मिट्टी, मिट्टी में रुकता पानी, उसी पानी से जन्म लेता कोई छोटा-सा झरना और उस झरने पर निर्भर पूरा गाँव। इनमें से एक कड़ी भी टूटे, तो असर बहुत दूर तक जाता है।

यही कारण है कि जंगल कभी एक दिन में नहीं मरते। वे धीरे-धीरे कमजोर होते हैं।

पहले एक सड़क निकलती है। फिर दूसरी। फिर जंगल का एक हिस्सा किसी और काम में चला जाता है। कहीं आग लगती है, कहीं अवैध कटान होती है, कहीं लगातार मानवीय दखल बढ़ता है। बाहर से देखने पर पेड़ अब भी खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन उनके बीच रहने वाले जीव जानते हैं कि उनका घर पहले जैसा नहीं रहा।

शायद इसीलिए सबसे पहले जंगल नहीं बोलता। उसके जानवर बोलते हैं।

हम अक्सर खबर पढ़ते हैं कि गूलदार गाँव में घुस आया, हाथियों ने फसल रौंद दी, भालू ने हमला कर दिया। हर घटना के पीछे कारण एक जैसा हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि जब जंगल सिकुड़ते हैं और वन्यजीवों के रास्ते टूटते हैं, तो उनका इंसानों के संपर्क में आना बढ़ जाता है। कई बार हम जानवर को समस्या मान लेते हैं, जबकि उसके पीछे की कहानी कहीं लंबी होती है।

फिर पानी का ख्याल आया।

बचपन में पहाड़ के जिन धारों और नौलों से पानी बहता देखा था, तब कभी यह नहीं सोचा कि उनका जंगलों से भी कोई रिश्ता होगा। बाद में समझ आया कि बारिश का पानी केवल आसमान से नहीं आता, उसे धरती में रोककर रखने वाला भी कोई चाहिए। जंगल वही काम करते हैं। वे पानी को पकड़ते हैं, उसे धीरे-धीरे मिट्टी के भीतर उतारते हैं और फिर वही पानी महीनों बाद किसी धारे या झरने के रूप में लौटता है। इसलिए कई बार जंगल का नुकसान उसी साल दिखाई नहीं देता। उसका असर आने वाले वर्षों में दिखाई देता है।

शायद इसी वजह से जंगल का हिसाब कुल्हाड़ी से नहीं लगाया जा सकता।

कितने पेड़ कटे, यह आँकड़ा है।

कितने पक्षियों ने अपना घोंसला छोड़ा, कितने जलस्रोत कमजोर हुए, कितनी मिट्टी बह गई, कितने जानवरों ने अपना रास्ता बदला और कितने गाँवों ने मौसम का बदलता स्वभाव महसूस किया—इसका कोई आसान हिसाब नहीं होता।

विकास भी जरूरी है। सड़कें भी चाहिएँ। अस्पताल भी, बिजली भी, स्कूल भी। लेकिन शायद असली सवाल यह नहीं कि विकास हो या जंगल बचें। असली सवाल यह है कि क्या हम विकास का ऐसा तरीका चुन रहे हैं, जिसमें जंगल आख़िरी कीमत न बन जाएँ? क्योंकि सड़क कुछ महीनों या वर्षों में बन जाती है, लेकिन जिस जंगल को हटाया जाता है, उसे अपनी परिपक्व अवस्था तक लौटने में कई दशक लग सकते हैं।

एक और बात समझ में आई।

जंगल कभी अपने लिए नहीं बचाए जाते।

उन्हें बचाने की बात हमेशा इंसान ही करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जंगलों को हमारी उतनी जरूरत नहीं, जितनी हमें उनकी है। यदि इंसान इस धरती से चला जाए, तो प्रकृति धीरे-धीरे अपना संतुलन फिर बना लेगी। लेकिन यदि जंगल चले गए, तो इंसान अपनी सारी तकनीक के बावजूद न बारिश बना पाएगा, न मिट्टी, न जलस्रोत और न ही वह जीवित संसार, जिसे बनने में लाखों वर्ष लगे हैं।

शायद इसी कारण जंगलों का सवाल केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह भविष्य का सवाल है।

हो सकता है आने वाले वर्षों में हमारे बच्चे हमसे यह न पूछें कि हमने कितने फ्लाईओवर बनाए, कितने बाँध बनाए या कितनी चौड़ी सड़कें बनाई। वे शायद इतना भर पूछें—
जब जंगल कम हो रहे थे, तब आपने किया क्या था?

उस दिन शायद हमारे पास आँकड़े बहुत होंगे, जवाब बहुत कम।

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