घर किसी एक व्यक्ति के श्रम से नहीं चलता। कोई पिता सुबह अँधेरे में काम पर निकलता है, कोई बेटा परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभालता है, कोई भाई खेत, दुकान या दफ़्तर की भागदौड़ में अपना दिन गुज़ारता है। उसी घर में एक माँ होती है, एक पत्नी होती है, एक बहन होती है, जिनका श्रम अक्सर किसी समय-सारिणी में दर्ज नहीं होता। घर की हर भूमिका का अपना महत्व है, क्योंकि घर तभी घर बनता है जब सब अपने-अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी निभाते हैं। लेकिन इन्हीं ज़िम्मेदारियों के बीच कुछ काम ऐसे भी होते हैं जो इतने नियमित, इतने स्वाभाविक और इतने रोज़मर्रा के हो जाते हैं कि एक समय बाद वे दिखाई देना ही बंद हो जाते हैं। खाना बनाना शायद उन्हीं में से एक है।
मुझे हमेशा लगता है कि किसी भी घर को समझना हो तो उसके बैठकखाने में नहीं, उसकी रसोई में कुछ देर बैठना चाहिए। वहाँ आपको किसी घर की आर्थिक स्थिति से ज़्यादा उसकी संवेदनाएँ दिखाई देंगी। कौन सबसे पहले उठता है, किसे सबसे बाद में खाना मिलता है, कौन अपनी थाली ठंडी होने तक दूसरों की थाली गरम रखता है–कई बार घर की सबसे बड़ी कहानियाँ रसोई में ही लिखी जाती हैं।
बचपन में घर का यह दृश्य लगभग रोज़ देखा करता था। सुबह घर के सभी लोग अपने-अपने कामों में लग जाते थे। कोई स्कूल जाने की तैयारी कर रहा होता, कोई दफ़्तर निकलने की जल्दी में होता, कोई खेत की ओर जा चुका होता। उस समय रसोई में माँ दिखाई देती थीं। कभी चूल्हे के सामने, कभी सब्ज़ी काटते हुए, कभी आटा गूँधते हुए। तब यह सब इतना सामान्य लगता था कि कभी ध्यान ही नहीं गया कि उनकी सुबह सबसे पहले शुरू होती है और रात सबसे बाद में ख़त्म।
समय बीत गया। घर वही रहे, बस हमारी भूमिकाएँ बदल गईं। आज जब अपने घर को देखता हूँ तो कई बार वही दृश्य फिर सामने आ जाता है। बस इस बार रसोई में माँ की जगह पत्नी दिखाई देती है। कभी चाय चढ़ाते हुए, कभी बच्चों के टिफ़िन की तैयारी करते हुए, कभी सबके खाने का समय अलग-अलग होने पर भी बिना शिकायत रसोई में लौटते हुए। तब समझ आता है कि समय बदलता है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन घर को हर दिन चलाने वाला यह मौन श्रम अक्सर वैसा ही बना रहता है। शायद कुछ काम इसलिए सबसे कम दिखाई देते हैं, क्योंकि वे कभी रुकते ही नहीं।
ऐसे ही एक दिन कुमार अंबुज की कविता पढ़ी। लगा जैसे वे किसी एक घर की नहीं, अनगिनत घरों की कहानी लिख रहे हों। वे लिखते हैं–
“जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया, फिर हिरणी होकर, फिर फूलों की डाली होकर…”
इन पंक्तियों में केवल एक स्त्री नहीं है। यहाँ जीवन के बदलते मौसम हैं। बचपन से युवावस्था तक, उत्साह से थकान तक, हर रूप बदलता है, लेकिन रसोई तक जाने वाला रास्ता नहीं बदलता।
हम अक्सर कहते हैं कि खाना बन गया। लेकिन सच यह है कि खाना केवल बनता नहीं, उसमें समय लगता है, धैर्य लगता है और कई बार अपने हिस्से की इच्छाओं को थोड़ी देर के लिए टाल देना भी पड़ता है। शायद इसी अनुभव को कुमार अंबुज आगे लिखते हैं–
“जब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूप, उन्होंने अपने सपनों को गूँधा, हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले…”
यह पढ़ते हुए लगता है कि आटा केवल पानी से नहीं गूँधा गया। उसमें किसी का अधूरा सपना भी मिला है।
समय बदला है। आज पहले की तुलना में बहुत कुछ बदल रहा है। अनेक घरों में पुरुष भी खाना बनाते हैं, रसोई संभालते हैं, बच्चों की देखभाल करते हैं। नई पीढ़ी साझेदारी की ओर बढ़ रही है और यह बदलाव स्वागतयोग्य है। लेकिन यह भी सच है कि आज भी अधिकांश घरों में यदि अचानक मेहमान आ जाएँ या रात देर से कोई भूखा घर लौटे, तो सबसे पहले नज़र रसोई की ओर ही जाती है।
और शायद इसी कारण कविता की अगली पंक्तियाँ भीतर तक उतर जाती हैं–
“उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया,
फिर बच्चे को गोद में लेकर,
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया…”
किसी भी घर में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं होता। उसमें परिवार की पसंद-नापसंद, बच्चों की आदतें, बुज़ुर्गों की ज़रूरतें, मौसम और मन–सब कुछ शामिल होता है। लेकिन खाने की थाली जब हमारे सामने आती है तो अक्सर हम उसका स्वाद तो परखते हैं, उसके पीछे लगा समय नहीं।
कुमार अंबुज इसी विडंबना को बहुत सहज ढंग से पकड़ते हैं–
“आप चीखे–उफ़, इतना नमक,
और भूल गए उन आँसुओं को
जो ज़मीन पर गिरने से पहले
गिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में…”
यहाँ नमक केवल खाने का नहीं है। यह उन अनदेखी भावनाओं का भी है जो अक्सर किसी रसोई में चुपचाप रह जाती हैं।
मुझे कविता का सबसे मार्मिक हिस्सा वह लगता है जहाँ वे लिखते हैं–
“कभी उनका पूरा सप्ताह इस ख़ुशी में गुज़र गया
कि पिछले बुधवार बिना चीख़े-चिल्लाए
खा लिया गया था खाना…”
सोचिए, यदि किसी व्यक्ति के सप्ताह की सबसे बड़ी खुशी केवल इतनी हो कि उसके श्रम को बिना शिकायत स्वीकार कर लिया गया, तो शायद हमें अपने व्यवहार पर भी एक बार ठहरकर सोचना चाहिए। धन्यवाद कहना कोई औपचारिकता नहीं, श्रम का सम्मान है।
जीवन आगे बढ़ता है। बच्चे बड़े हो जाते हैं। घर बदलते हैं। ज़िम्मेदारियाँ बदलती हैं। लेकिन शरीर भी तो बदलता है। कमर पहले जैसी नहीं रहती, घुटनों में दर्द उतर आता है, आँखों की रोशनी कम होने लगती है। फिर भी रसोई की घड़ी अक्सर उसी समय चलती रहती है।
कविता के अंतिम दृश्य में यही जीवन दिखाई देता है–
“पिछले कई दिनों से उन्होंने
बैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया है,
हालाँकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है।”
यह दृश्य किसी एक घर का नहीं है। शायद हममें से अधिकांश ने इसे अपने घर में, दादी के घर में, पड़ोस में या किसी रिश्तेदार के यहाँ कभी न कभी देखा होगा। बस अंतर इतना है कि उस समय हमने इसे जीवन का सामान्य हिस्सा मान लिया।
शायद अब समय केवल यह कहने का नहीं कि खाना अच्छा बना है। समय यह समझने का भी है कि उस भोजन तक पहुँचने में किसी ने अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपने जीवन का कितना हिस्सा लगाया है। जिस दिन हम यह समझ लेंगे, उस दिन भोजन केवल स्वाद नहीं रहेगा, वह श्रम, स्नेह और साझेदारी का सम्मान भी बन जाएगा।
आख़िरकार, घर केवल कमाई से नहीं चलता और केवल रसोई से भी नहीं। घर तब चलता है जब दोनों एक-दूसरे के श्रम को समझते हैं। शायद कुमार अंबुज की यह कविता भी अंततः हमें यही याद दिलाती है कि हर थाली में केवल भोजन नहीं परोसा जाता, उसमें किसी का समय, किसी का धैर्य और किसी का मौन प्रेम भी शामिल होता है।
यह भी पढ़ें: “एक उम्र बाद मैं वापस लौट आऊँगा”: एक पहाड़ी मन की कहानी
यह भी पढ़ें: जिस समाज में हर कोई बोल रहा है, वहाँ सुन कौन रहा है?




