“एक उम्र बाद मैं वापस लौट आऊँगा”: एक पहाड़ी मन की कहानी

मेरे बटुए में आज भी एक पुरानी चाबी रखी है। शायद वह अब किसी ताले में फिट भी न बैठे, लेकिन मेरे लिए वह घर लौटने का वादा है। शहर में रहते हुए आदमी बहुत कुछ बदल देता है–रहने की जगह, बोलने का तरीका, खाने का समय, सोने की आदतें और कई बार अपने सपनों की शक्ल भी। लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलतीं। जैसे मन के किसी कोने में रखा अपना गांव। जैसे बंद पड़े घर का दरवाज़ा। जैसे वह रास्ता, जो सालों बाद भी याद रहता है।
पुराना बटुआ और लोहे की चाबी के साथ पहाड़ में स्थित पैतृक घर

एक उम्र तक शहर में कमाऊँगा।

जिम्मेदारियाँ निभाऊँगा।

बच्चों का भविष्य बनाऊँगा।

किराया, किस्तें, फीस, दवाइयाँ और घर की जरूरतें पूरी करूँगा।

फिर एक दिन, जब जीवन की दौड़ थोड़ी धीमी पड़ जाएगी, मैं अपने पहाड़ लौटूँगा।

सबसे पहले अपने पुराने घर के दरवाज़े पर खड़ा होऊँगा।

जेब से वही पुरानी चाबी निकालूँगा।

चौखट को छूकर देखूँगा।

दरवाज़े पर जमी धूल हटाऊँगा।

और धीरे से वह घर खोलूँगा, जिसे छोड़कर तो आया था, लेकिन कभी भूल नहीं पाया।

सालों बाद फिर खुलने वाला पहाड़ी घर

अंदर शायद सब कुछ वैसा न हो।

दीवारों पर नमी हो सकती है।

आँगन में घास उग आई होगी।

लकड़ी की खिड़कियाँ जाम हो गई होंगी।

छत से धूप अब पहले जैसी नहीं उतरती होगी।

लेकिन फिर भी, वह घर मेरा होगा।

उसकी चुप्पी भी अपनी लगेगी।

उसकी टूटी चीजें भी अपनी लगेंगी।

उसके खाली कमरे भी जैसे कहेंगे—आ गया?

मैं सबसे पहले खिड़कियाँ खोलूँगा।

देखूँगा कि धूप अब भी उसी तरह आँगन में उतरती है या नहीं।

फिर आँगन में उगी घास साफ करूँगा।

चौखट पर जमी धूल हटाऊँगा।

उस पगडंडी तक जाऊँगा, जो कभी नौले की ओर जाती थी।

देखूँगा कि रास्ता अब भी पहचाना जा सकता है या नहीं।

पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों का दृश्य

फिर उन सीढ़ीनुमा खेतों तक जाऊँगा, जिन्हें लोग अब बंजर कहने लगे हैं।

मेड़ों पर हाथ फेरूँगा।

मिट्टी को छूकर देखूँगा।

और मन ही मन सोचूँगा कि यहाँ फिर कुछ उगाया जा सकता है।

थोड़ा मंडुवा।

थोड़ा झंगोरा।

कुछ आलू।

कुछ राजमा।

और शायद अपने लौटने की थोड़ी-सी उम्मीद।

घर के पास दो गायें होंगी।

कुछ बकरियाँ होंगी।

और आँगन की रखवाली करता भोटिया नस्ल का एक वफादार पहाड़ी कुत्ता होगा।

गढ़वाल के एक पारंपरिक घर के आंगन में बैठा भोटिया कुत्ता, पास में खड़ी गायें और घूमती हुई बकरियां।

सुबह जल्दी उठूँगा।

पहाड़ों पर पड़ती पहली धूप देखूँगा।

नालों और गदेरों के साफ पानी में झाँककर देखूँगा कि बचपन अब भी कहीं बह रहा है या नहीं।

कभी किसी शांत ताल के किनारे बैठूँगा।

पानी में अपना चेहरा देखूँगा।

और शायद पहली बार महसूस करूँगा कि आज़ादी बहुत बड़ी चीज नहीं होती।

कई बार वह बस इतना होती है कि आदमी अपने समय का मालिक हो जाए।

दिन में साधारण-सा झोल-भात पकाऊँगा।

शहर की महंगी थालियों से ज्यादा अपना लगेगा वह खाना।

क्योंकि उसमें जल्दी नहीं होगी।

हिसाब नहीं होगा।

भागदौड़ नहीं होगी।

बस घर की चूल्हे की गर्माहट होगी।

शाम होते ही खेतों की मेड़ों पर निकलूँगा।

गांव के बच्चों की आवाज़ें सुनूँगा।

किसी घर से आती गाय की घंटी सुनाई देगी।

कहीं दूर किसी आँगन में लकड़ी फटने की आवाज़ आएगी।

और धीरे-धीरे लगेगा कि गांव पूरी तरह खाली नहीं हुआ था।

कुछ आवाज़ें अब भी मेरा इंतज़ार कर रही थीं।

रात को गायों को छानी में बाँधूँगा।

दरवाज़ा ठीक से लगाऊँगा।

फिर जल्दी खा-पीकर लकड़ी की खिड़की के पास बैठ जाऊँगा।

पहाड़ की रात और तारों से भरा आसमान

बाहर शहर की रोशनी नहीं होगी।

कोई हॉर्न नहीं होगा।

कोई भागती सड़क नहीं होगी।

सिर्फ पहाड़ का पूरा आसमान होगा।

तारे होंगे।

ठंडी हवा होगी।

और भीतर एक अजीब-सा सुकून होगा।

शायद पहाड़ी मन के लिए सफलता यही है।

बहुत बड़ा आदमी बन जाना नहीं।

बहुत पैसा जमा कर लेना भी नहीं।

सफलता शायद इतनी-सी है कि एक दिन आदमी अपनी ही चाबी से अपना बंद पड़ा घर फिर खोल सके।

अपने बंजर खेतों तक फिर जा सके।

अपने नौले का पानी फिर देख सके।

अपने आँगन की धूप फिर पहचान सके।

और रात को तारों को देखते हुए कह सके—

अब मैं लौट आया हूँ।

शहर से नहीं।

अपनी थकान से।

अपनी मजबूरियों से।

अपने अधूरेपन से।

अपने पहाड़ की ओर।

क्योंकि पहाड़ छोड़ देने से पहाड़ छूटता नहीं।

वह आदमी के भीतर बस जाता है।

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