उत्तराखंड में मदरसों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर सख्ती, नियम तोड़ने पर लगेगा पांच लाख जुर्माना

संशोधित कानून के तहत अब केवल जुर्माना ही नहीं, बल्कि मान्यता, प्रशासन, वित्तीय जवाबदेही और संचालन से जुड़े नियमों का पालन भी अनिवार्य होगा। किन परिस्थितियों में संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और नए प्रावधानों में क्या बदलाव हुए हैं, जानिए।
Students study religious texts during a class at a madrasa.

देहरादून, 8 जुलाई। उत्तराखंड में मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता और संचालन से जुड़े नियमों को और सख्त कर दिया गया है। उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 में अध्यादेश के माध्यम से संशोधन किया गया है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) की मंजूरी के बाद उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम (संशोधन) अध्यादेश, 2026 लागू हो गया है।

संशोधन के बाद नियमों का उल्लंघन करने वाले मदरसों और दूसरे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण कार्रवाई कर सकेगा। बिना जरूरी मान्यता के धार्मिक शिक्षा देने या मान्यता से जुड़ी शर्तों का उल्लंघन करने पर जांच के बाद संस्थान पर तालाबंदी की जा सकेगी।

नए प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में संस्थान के संचालकों पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके साथ ही प्राधिकरण संबंधित संस्थान में प्रशासक नियुक्त कर सकेगा। यदि जांच के दौरान कोई आपराधिक कृत्य सामने आता है, तो संबंधित कानूनों के तहत प्राथमिकी दर्ज कराने की कार्रवाई भी की जा सकेगी।

हालांकि, कार्रवाई से पहले संबंधित संस्थान के संचालकों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद जांच रिपोर्ट और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, अधिनियम की धारा-16 में प्राधिकरण को नियमों का उल्लंघन करने वाले मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर कार्रवाई का अधिकार दिया गया है। धारा-14 के मान्यता संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन होने पर संस्थान की मान्यता समाप्त की जा सकती है। शुल्क, दान, अनुदान या अन्य वित्तीय स्रोतों से मिली धनराशि के दुरुपयोग की स्थिति में भी मान्यता रद्द करने का प्रावधान है।

संशोधन के बाद धारा-16 में नया खंड जोड़ा गया है। इसके तहत यदि प्राधिकरण को यह जानकारी मिलती है कि बिना मान्यता धार्मिक शिक्षा दी जा रही है या मान्यता की शर्तों का पालन नहीं हो रहा है, तो विस्तृत जांच के बाद संस्थान के खिलाफ तालाबंदी, जुर्माना, प्रशासक की नियुक्ति और आपराधिक मामला मिलने पर प्राथमिकी जैसी कार्रवाई की जा सकेगी।

मान्यता से जुड़े नियमों के तहत संस्थान का अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से स्थापित और संचालित होना जरूरी होगा। संस्थान का परिषद या बोर्ड से संबद्ध होना, प्रबंधन समिति का पंजीकृत होना, भूमि का संबंधित सोसाइटी, न्यास या कंपनी के नाम होना और वित्तीय लेन-देन बैंक खाते के माध्यम से होना भी अनिवार्य किया गया है।

इसके अलावा संस्थान में निर्धारित योग्यता वाले शिक्षक होने चाहिए। संस्थान किसी छात्र या कर्मचारी को धार्मिक गतिविधि में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं कर सकेगा। साथ ही ऐसा कोई काम नहीं किया जा सकेगा, जिससे सांप्रदायिक या सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो।

संशोधन में पाठ्यक्रम और संचालन से जुड़े कुछ प्रावधानों में भी बदलाव किया गया है। पहले अल्पसंख्यक प्राधिकरण की ओर से तैयार पाठ्यक्रम पर उत्तराखंड बोर्ड के अनुमोदन की जरूरत थी। रिपोर्ट के अनुसार, अब इस शर्त को हटा दिया गया है। इसी तरह धारा-12 की उपधारा-3 से भी उत्तराखंड बोर्ड के अनुमोदन से जुड़ा प्रावधान हटाया गया है।

प्रदेश में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर पहले भी बड़ा बदलाव किया जा चुका है। राज्य में मदरसा बोर्ड की जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को जिम्मेदारी दी गई है। नई व्यवस्था में मदरसों के साथ अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता, संचालन और पाठ्यक्रम से जुड़े मामलों में प्राधिकरण की भूमिका अहम होगी।

इस बदलाव के बाद राज्य में संचालित मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता और संचालन से जुड़े नए प्रावधानों का पालन करना होगा। नियमों का उल्लंघन मिलने पर प्राधिकरण जांच के आधार पर कार्रवाई कर सकेगा।

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