धराली पहुँचते ही सबसे पहले नज़र सड़क पर जाती है। वह अब पहले वाली जगह पर नहीं है। भागीरथी के किनारे से कुछ दूरी पर नया रास्ता तैयार किया गया है। बाज़ार की तरफ बढ़ने पर पता चलता है कि बदलाव सिर्फ़ सड़क का नहीं है। जहाँ कभी यात्रियों की आवाजाही रहती थी, वहाँ अब मलबे में दबे भवन हैं, बंद दुकानें हैं और उनके बीच अपनी ज़िंदगी फिर से खड़ी करने की कोशिश करते लोग।
उत्तरकाशी जिले के धराली में 5 अगस्त 2025 को आई आपदा को आज एक साल पूरा हो गया। बारह महीने पहले जो कुछ घंटों में बदल गया था, उसे फिर से खड़ा करने की प्रक्रिया अब भी जारी है।
उस दिन लगातार बारिश के बाद ऊपरी ढलानों से पानी, मिट्टी और बड़े पत्थरों का तेज बहाव खीरगंगा के रास्ते धराली तक पहुँचा। कुछ ही समय में बहाव ने मकानों, होटलों, होमस्टे, दुकानों और सड़कों को अपनी चपेट में ले लिया। बाद में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने उपग्रह चित्रों के आधार पर धराली और हर्षिल क्षेत्र में मलबे से भरी अचानक आई बाढ़ तथा भवनों, पुलों और सड़कों को हुए नुकसान की पुष्टि की।
मार्च 2026 तक प्रशासनिक रिकॉर्ड में इस आपदा से जुड़े 69 लोगों को मृत माना गया। इनमें कई ऐसे लोग भी शामिल थे जो घटना के बाद लापता हो गए और जिनका अब तक पता नहीं चल सका। न्यूज़लॉन्ड्री की जमीनी रिपोर्ट के अनुसार मकान, होटल और होमस्टे समेत करीब 150 भवन नष्ट हुए।
धराली गंगोत्री यात्रा मार्ग का एक प्रमुख पड़ाव रहा है। हर यात्रा सीजन के साथ यहाँ के होटल भरते थे, होमस्टे में मेहमान ठहरते थे और छोटी-छोटी दुकानें खुली रहती थीं। गाँव के अनेक परिवारों की आय इसी आवाजाही पर निर्भर थी। आपदा में जब भवन गिरे, तब उनके साथ कई परिवारों का कारोबार भी रुक गया।
एक साल बाद भी कई प्रभावित परिवार पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी होने का इंतज़ार कर रहे हैं। जिलाधिकारी प्रशांत आर्य के अनुसार पात्र परिवारों को पाँच लाख रुपये की सहायता दो किस्तों में दी जा रही है। मार्च 2026 में 115 परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की गई और सुरक्षित जमीन की पहचान के लिए भूगर्भीय निरीक्षण कराया गया।
धराली में अब नई सड़क है। कुछ दुकानें फिर खुल चुकी हैं। लेकिन बाज़ार में चलते हुए यह समझने में देर नहीं लगती कि निर्माण और पुनर्निर्माण एक ही बात नहीं हैं। सड़क बन सकती है, इमारतें भी दोबारा खड़ी हो सकती हैं, लेकिन जिन परिवारों का घर और रोज़गार एक साथ गया, उनके लिए लौटना कहीं लंबी प्रक्रिया है।
धराली की यह तस्वीर हिमालय के सामने खड़े उस सवाल को भी दोहराती है, जिस पर वर्षों से चर्चा होती रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश, अस्थिर ढलानों पर निर्माण, नदी किनारे बढ़ती बसावट और प्राकृतिक जल निकासी के मार्गों में बदलाव, ऐसे क्षेत्रों में नुकसान को बढ़ा सकते हैं। इसलिए सड़क, अस्पताल और घर बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह तय करना भी है कि वे कहाँ और किस तरह बनें।
धराली में आज लोग फिर अपने काम पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बाज़ार भी धीरे-धीरे खुल रहा है। लेकिन इस गाँव की कहानी अभी पूरी नहीं हुई।
आपदा का असर केवल जमीन और इमारतों तक सीमित नहीं रहा। कई परिवारों के लिए तेज बारिश आज भी बेचैनी का कारण बन जाती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, कई लोगों के मन में यह आशंका बनी रहती है कि कहीं पहाड़ से फिर वैसा ही मलबा न उतर आए। इसलिए पुनर्वास केवल घर बनाने या मुआवज़ा देने की प्रक्रिया नहीं है।असली पुनर्वास तब पूरा माना जाएगा, जब धराली में मानसून फिर से मौसम कहलाए, डर नहीं।




