उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का संघर्ष दशकों तक चला। इस आंदोलन में अनेक लोगों ने अपनी भूमिका निभाई, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो उत्तराखंड के इतिहास से हमेशा के लिए जुड़ गए। इन्हीं में से एक थे इंद्रमणि बडोनी, जिन्हें उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिना जाता है।
सादगी, अहिंसा और जनसंघर्ष के रास्ते पर चलने वाले बडोनी को अक्सर ‘उत्तराखंड का गांधी’ और ‘पर्वतीय गांधी’ कहा जाता है। राजनीति के साथ-साथ शिक्षा, लोकसंस्कृति, ग्रामीण विकास और उत्तराखंड की अलग पहचान को लेकर किए गए उनके प्रयासों ने उन्हें केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि पहाड़ के जननायक के रूप में स्थापित किया।
टिहरी गढ़वाल के छोटे से गांव में हुआ जन्म
इंद्रमणि बडोनी का जन्म 24 दिसंबर 1925 को तत्कालीन टिहरी गढ़वाल के अखोड़ी गांव में हुआ था। उनके माता-पिता का नाम कलदी देवी और सुरेशानंद था। उनका शुरुआती जीवन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव से प्राप्त की और बाद में नैनीताल तथा देहरादून में पढ़ाई की। वर्ष 1949 में उन्होंने डीएवी पीजी कॉलेज, देहरादून से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
जीवन के शुरुआती दौर में रोजगार की तलाश उन्हें मुंबई तक ले गई, लेकिन बाद में वे वापस पहाड़ लौट आए। यही वापसी आगे चलकर उत्तराखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण साबित हुई।
लोकसंस्कृति से था गहरा जुड़ाव
इंद्रमणि बडोनी की पहचान केवल एक राजनेता या आंदोलनकारी के रूप में नहीं थी। उनका उत्तराखंड की लोकसंस्कृति से भी गहरा संबंध था। वे रंगमंच से जुड़े थे और लोक वाद्य बजाने में भी रुचि रखते थे।
वर्ष 1956 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के राजपथ पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति से जुड़ी प्रस्तुति के आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
यह उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसमें उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और पहाड़ी पहचान के संरक्षण की सोच दिखाई देती है।
सामाजिक कार्यों से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन
1950 के दशक में बडोनी का रुझान ग्रामीण विकास और सामाजिक कार्यों की ओर बढ़ा। गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने गांव और पहाड़ के विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करना शुरू किया।
1961 में वे ग्राम प्रधान बने और बाद में जखोली विकासखंड के प्रमुख भी बने।
उनका राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ था। यही कारण था कि पहाड़ की शिक्षा, सड़क, रोजगार, पलायन और प्रशासन से जुड़ी समस्याओं को वे जमीनी स्तर पर समझते थे।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने काम किया और गढ़वाल क्षेत्र में कई विद्यालयों की स्थापना से जुड़े प्रयास किए।
देवप्रयाग से पहुंचे उत्तर प्रदेश विधानसभा
इंद्रमणि बडोनी ने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में अपनी जगह बनाई। 1967 में वे देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए।
इसके बाद 1969 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में उन्होंने चुनाव जीता। वर्ष 1977 में वे एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे।
राजनीतिक जीवन में चुनावी हार भी उनके हिस्से आई, लेकिन उनकी पहचान धीरे-धीरे चुनावी राजनीति से कहीं अधिक उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के अधिकारों की आवाज के रूप में बनने लगी।
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग
उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन का रूप ले रही थी। पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, विकास संबंधी चुनौतियों और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए अलग राज्य की मांग को लगातार समर्थन मिलने लगा।
इंद्रमणि बडोनी इस आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हुए।
वे उत्तराखंड क्रांति दल से जुड़े और अलग पर्वतीय राज्य की मांग को गांव-गांव तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाई। उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना भी अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को राजनीतिक मंच देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थी।
बडोनी का मानना था कि पहाड़ की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था आवश्यक है।
105 दिनों की ऐतिहासिक पदयात्रा
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में बडोनी की सबसे चर्चित पहलों में से एक थी 1988 की 105 दिनों की पदयात्रा।
यह यात्रा पिथौरागढ़ के तवाघाट से देहरादून तक की गई। इसका उद्देश्य अलग उत्तराखंड राज्य की आवश्यकता को आम लोगों तक पहुंचाना और राज्य आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाना था।
इस यात्रा के दौरान बडोनी गांवों में पहुंचे, लोगों से संवाद किया और उन्हें समझाया कि अलग राज्य बनने से पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं को बेहतर ढंग से उठाया जा सकता है।
इस पदयात्रा ने उन्हें आंदोलन के एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जो केवल मंच से भाषण देने के बजाय सीधे लोगों के बीच जाकर संवाद करता था।
गैरसैंण को लेकर दूरदर्शी सोच
उत्तराखंड की राजनीति में गैरसैंण का प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है। इंद्रमणि बडोनी ने काफी पहले गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने का विचार सामने रखा था।
1992 में बागेश्वर में मकर संक्रांति के अवसर पर उन्होंने गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी घोषित करने की बात कही।
इसके पीछे पहाड़ के केंद्र में प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने और पर्वतीय क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में रखने की सोच थी।
यही कारण है कि गैरसैंण से जुड़ी राजनीतिक और जनभावनाओं की चर्चा में आज भी बडोनी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
1994 का आंदोलन और आमरण अनशन
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में 1994 निर्णायक वर्ष साबित हुआ।
अलग राज्य की मांग को लेकर इंद्रमणि बडोनी ने पौड़ी में आमरण अनशन शुरू किया। आंदोलन तेज होने के बाद प्रशासन ने उन्हें वहां से हटाया और अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में उन्हें दिल्ली के एम्स ले जाया गया।
इस घटनाक्रम के बाद आंदोलन और व्यापक हुआ। उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में अलग राज्य की मांग तेजी से जनआंदोलन में बदलने लगी।
बडोनी ने अपने संघर्ष में अहिंसक आंदोलन, पदयात्रा, जनसंवाद और अनशन जैसे गांधीवादी तरीकों को प्राथमिकता दी। इसी कारण उनकी तुलना महात्मा गांधी से की जाने लगी और उन्हें ‘पर्वतीय गांधी’ कहा गया।
राज्य बनने से पहले हुआ निधन
इंद्रमणि बडोनी जिस उत्तराखंड के निर्माण के लिए वर्षों तक संघर्ष करते रहे, उसे अलग राज्य बनते हुए वे स्वयं नहीं देख सके।
18 अगस्त 1999 को ऋषिकेश में उनका निधन हो गया।
इसके करीब एक वर्ष बाद, 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड नया राज्य बना। उस समय राज्य का नाम उत्तरांचल रखा गया था, जिसे बाद में उत्तराखंड कर दिया गया।
इस तरह जिस राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्य के लिए बडोनी ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समर्पित किया, वह उनके निधन के बाद साकार हुआ।
क्यों कहा जाता है इंद्रमणि बडोनी को ‘उत्तराखंड का गांधी’?
इंद्रमणि बडोनी की राजनीति का आधार सत्ता से अधिक जनसंघर्ष था। उन्होंने अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ाने के लिए हिंसा के बजाय अहिंसा, सत्याग्रह, पदयात्रा और अनशन का रास्ता अपनाया।
उनकी सादगी और गांधीवादी आंदोलन शैली के कारण उन्हें ‘उत्तराखंड का गांधी’ या ‘पर्वतीय गांधी’ कहा जाने लगा।
लेकिन उनकी विरासत केवल राज्य आंदोलन तक सीमित नहीं है। ग्रामीण विकास, शिक्षा, पहाड़ी संस्कृति और स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी जैसे विषय भी उनके सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से रहे।
इंद्रमणि बडोनी की विरासत
आज उत्तराखंड भारत का एक अलग राज्य है, लेकिन इसके निर्माण के पीछे कई दशकों का संघर्ष और हजारों आंदोलनकारियों का योगदान रहा है।
इंद्रमणि बडोनी उस संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक हैं।
24 दिसंबर को उनकी जयंती उनके जीवन, पहाड़ के प्रति उनकी सोच और उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनके योगदान को याद करने का अवसर है। वहीं 18 अगस्त उनकी पुण्यतिथि के रूप में उन्हें याद करने का दिन है।
बडोनी की कहानी उत्तराखंड के इतिहास का वह अध्याय है जिसमें एक छोटे पहाड़ी गांव से निकला व्यक्ति ग्राम प्रधान से विधायक तक पहुंचता है, लेकिन अंततः उसकी सबसे बड़ी पहचान किसी राजनीतिक पद से नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य के लिए किए गए संघर्ष से बनती है।
इंद्रमणि बडोनी आज भी उत्तराखंड की क्षेत्रीय अस्मिता, जनसंघर्ष और पहाड़ के विकास की आकांक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रतीक बने हुए हैं।
यह भी पढ़ें: एक जवान, एक पोस्ट और 72 घंटे की लड़ाई, शहादत के बाद भी मिलती हैं छुट्टी और प्रमोशन
यह भी पढ़ें: वह पहाड़ी खोजी, जिसने कदम गिनकर तिब्बत का नक्शा बना दिया




