उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य बनाने की लड़ाई नहीं था। इसके पीछे एक बड़ा सवाल यह भी था कि पहाड़ का शासन आखिर पहाड़ से क्यों नहीं चल सकता?
इसी सोच के साथ अलग उत्तराखंड की मांग के दौरान गैरसैंण राजधानी की अवधारणा से जुड़ता गया। आंदोलनकारियों के लिए गैरसैंण केवल नक्शे पर मौजूद एक छोटा पहाड़ी कस्बा नहीं था। वह उस उत्तराखंड की परिकल्पना का प्रतीक बन गया जिसमें सत्ता और विकास का केंद्र पहाड़ के भीतर हो।
यही वजह है कि आज भी उत्तराखंड की स्थायी राजधानी की चर्चा होते ही गैरसैंण का नाम सबसे पहले सामने आता है।
गैरसैंण ही क्यों?
इस सवाल का सबसे सीधा जवाब उसकी भौगोलिक स्थिति में मिलता है।
गैरसैंण चमोली जिले में स्थित है और इसे लंबे समय से गढ़वाल और कुमाऊँ के बीच स्थित क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। राज्य आंदोलन के दौरान यह तर्क दिया गया कि प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी ऐसी जगह होनी चाहिए जो दोनों मंडलों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
इसी भौगोलिक केंद्रीयता के कारण गैरसैंण आंदोलनकारियों के लिए स्वाभाविक विकल्प बनता गया।
लेकिन मामला केवल नक्शे के बीच की जगह चुनने का नहीं था।
जिस कारण अलग राज्य मांगा, राजधानी भी उसी सोच के अनुरूप हो
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़ में पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियां और विकास से जुड़ी समस्याएं थीं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दूर बसे पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासनिक पहुंच जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से असंतोष था।
इसलिए आंदोलनकारियों के एक बड़े हिस्से की सोच थी कि अगर अलग पर्वतीय राज्य बनने के बाद भी उसकी पूरी सत्ता मैदानी क्षेत्र में केंद्रित हो गई, तो राज्य निर्माण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
इसी विचार को सरल शब्दों में एक भावना के रूप में समझा जा सकता है:
पहाड़ का राज्य है, तो उसकी सत्ता का केंद्र भी पहाड़ में होना चाहिए।
गैरसैंण इस विचार का सबसे मजबूत प्रतीक बन गया। राज्य आंदोलन से जुड़े समूह आज भी गैरसैंण की मांग को पर्वतीय क्षेत्रों की आकांक्षाओं और राज्य निर्माण के उद्देश्यों से जोड़ते हैं।
गैरसैंण को राजधानी के रूप में देखने का विचार 1990 के दशक में अचानक पैदा नहीं हुआ था।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने 1960 के दशक में गैरसैंण को भावी पहाड़ी राज्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया था। बाद के वर्षों में यह विचार उत्तराखंड राज्य आंदोलन के साथ और मजबूत होता गया।
1989 तक आंदोलन से जुड़े प्रमुख लोगों के बीच गैरसैंण को प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी के रूप में स्वीकार करने की सोच स्पष्ट रूप से सामने आने लगी थी।
इसके बाद इस विचार को सबसे मजबूत राजनीतिक पहचान उत्तराखंड क्रांति दल और इंद्रमणि बडोनी के दौर में मिली।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के जननायक इंद्रमणि बडोनी गैरसैंण की राजधानी की परिकल्पना से गहराई से जुड़े रहे।
1992 में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के दौरान बडोनी ने गैरसैंण को प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी घोषित किया। उत्तराखंड क्रांति दल ने भी उसी दौर में गैरसैंण को भावी राज्य की राजधानी के रूप में औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया।
इस कदम का महत्व केवल राजनीतिक घोषणा तक सीमित नहीं था।
बडोनी और दूसरे आंदोलनकारियों के लिए सवाल यह था कि यदि उत्तराखंड पहाड़ की परिस्थितियों के कारण अलग राज्य बनेगा, तो उसके प्रशासन का केंद्र भी उन परिस्थितियों के करीब होना चाहिए।
यहीं से गैरसैंण राज्य आंदोलन की राजनीतिक मांग के साथ-साथ उत्तराखंड की अस्मिता का प्रतीक भी बनने लगा।
1994 की कौशिक समिति ने भी गैरसैंण को माना उपयुक्त
गैरसैंण की मांग केवल आंदोलनकारी संगठनों तक सीमित नहीं रही।
1994 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित रमाशंकर कौशिक समिति ने अलग उत्तराखंड राज्य के प्रश्न पर विचार किया। सरकारी दस्तावेजों और बाद के अभिलेखों में भी दर्ज है कि समिति ने प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी के लिए गैरसैंण को सबसे उपयुक्त स्थान माना था।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि अब गैरसैंण केवल आंदोलनकारियों द्वारा सुझाया गया स्थान नहीं था। एक सरकारी समिति की सिफारिश ने भी इस मांग को आधार दिया।
इसके बाद गैरसैंण उत्तराखंड आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में शामिल होता चला गया।
गैरसैंण का मतलब था सत्ता का विकेंद्रीकरण
राजधानी केवल मुख्यमंत्री, सचिवालय और विधानसभा की जगह नहीं होती। राजधानी के साथ सरकारी कार्यालय, अधिकारी, कर्मचारी, संस्थान, सड़कें, व्यवसाय और दूसरी आर्थिक गतिविधियां भी विकसित होती हैं।
इसीलिए गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग के पीछे एक विकास संबंधी सोच भी थी।
आंदोलनकारियों की परिकल्पना में पहाड़ के भीतर राजधानी होने से प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र पर्वतीय क्षेत्र में विकसित हो सकता था। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएं शासन के ज्यादा करीब आ सकती थीं।
इसलिए गैरसैंण का सवाल धीरे-धीरे सिर्फ “राजधानी कहां हो?” से आगे बढ़कर “उत्तराखंड का विकास मॉडल कैसा हो?” का सवाल बन गया।
फिर 2000 में गैरसैंण राजधानी क्यों नहीं बना?
यह इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना, लेकिन गैरसैंण के बजाय देहरादून को अंतरिम राजधानी बनाया गया।
इसका प्रमुख व्यावहारिक कारण था कि देहरादून में पहले से प्रशासनिक ढांचा, आवास, सड़क संपर्क और अन्य सुविधाएं उपलब्ध थीं, जबकि उस समय गैरसैंण में नई राजधानी चलाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित नहीं था। रेल और हवाई संपर्क की कमी भी एक बड़ी चुनौती थी।
यहीं से एक विरोधाभास पैदा हुआ।
जिस राज्य आंदोलन में गैरसैंण राजधानी की परिकल्पना इतनी मजबूत थी, राज्य बनने के बाद उसकी सत्ता देहरादून से चलने लगी।
लेकिन गैरसैंण की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई
राज्य बनने के बाद भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग लगातार उठती रही।
आखिरकार गैरसैंण के निकट भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन बनाया गया और वहां विधानसभा सत्र आयोजित होने लगे।
इसके बाद 2020 में गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया।
सरकारी दस्तावेज भी स्वीकार करते हैं कि गैरसैंण लगभग गढ़वाल और कुमाऊँ के मध्य स्थित है और पहाड़ी क्षेत्रों में इसे राजधानी बनाए जाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है।
लेकिन गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का प्रश्न आज भी उत्तराखंड की राजनीति और जनभावनाओं में मौजूद है।
इसलिए गैरसैंण केवल राजधानी का नाम नहीं है
गैरसैंण को समझने के लिए उसे केवल देहरादून के विकल्प के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
राज्य आंदोलनकारियों के लिए गैरसैंण के पीछे एक पूरी सोच थी:
पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ के करीब बैठकर हो।
गढ़वाल और कुमाऊँ के बीच संतुलन हो। शासन पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़ा रहे। विकास कुछ मैदानी शहरों तक सीमित न हो और जिस उद्देश्य से उत्तराखंड मांगा गया था, उसकी पहचान राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में भी दिखाई दे।
इसीलिए गैरसैंण उत्तराखंड में सिर्फ एक स्थान नहीं रहा।
वह उस सवाल का प्रतीक बन गया कि उत्तराखंड आखिर किस सोच के साथ बनाया गया था और राज्य बनने के बाद हम उस सोच के कितने करीब पहुंच पाए।
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