उत्तराखंड में किन क्षेत्रों को ग्लेशियर झीलों से खतरा, 13 झीलें चिह्नित; सरकार बढ़ाएगी निगरानी और अर्ली वार्निंग

ऊंचाई वाले जलस्रोतों में बदलाव की स्थिति में नीचे की घाटियों तक असर पहुंच सकता है, इसलिए अब सिर्फ झीलों की पहचान पर्याप्त नहीं होगी। सरकार का अगला फोकस यह तय करने पर है कि संभावित घटना की स्थिति में किन इलाकों को पहले चेतावनी मिले, निकासी कैसे हो और स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया कितनी जल्दी दी जा सके। चिह्नित झीलों में अब तक क्या सर्वे हुआ है और किन क्षेत्रों में अगला अध्ययन प्रस्तावित है, इसकी पूरी जानकारी आगे देखें।
Himalayan lakes and high-altitude water bodies in Uttarakhand

देहरादून, 28 अगस्त। हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरे को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। नेपाल में हाल में आई बाढ़ के बाद राज्य सरकार ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन करने के साथ ऐसे इलाकों के लिए अर्ली वार्निंग और आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था बेहतर करने के निर्देश दिए हैं।

नेपाल में 26 अगस्त को तिब्बत सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानी हिस्से के बड़े पैमाने पर धंसने के बाद अचानक तेज बाढ़ आई। मलबा और पानी तेजी से नीचे की घाटियों में पहुंचा, जिससे सड़कें, पुल, बस्तियां और अन्य बुनियादी ढांचा गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। इस घटना के बाद हिमालयी राज्यों में ग्लेशियर और ऊंचाई वाले जलस्रोतों की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ी है और उत्तराखंड ने भी अपनी तैयारियों की समीक्षा तेज की है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उत्तराखंड में जोखिम के लिहाज से 13 ग्लेशियर झीलों को चिह्नित किया है। इनमें से पांच झीलें Category-A यानी अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखी गई हैं। राज्य सरकार अब इन झीलों की नियमित निगरानी और चरणबद्ध वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर दे रही है।

इन 13 चिह्नित झीलों में से चार का सर्वे पहले ही किया जा चुका है। इनमें चमोली जिले का वसुधारा ताल और पिथौरागढ़ की माबांग, स्युन्तियांगती और प्यूनग्रू झील शामिल हैं। सर्वे के जरिए झीलों की मौजूदा स्थिति और उनसे जुड़े संभावित जोखिम का आकलन किया गया है।

अब आपदा प्रबंधन विभाग की विशेषज्ञ टीमों को चमोली जिले के सरस्वती ताल और उत्तरकाशी के केदारताल के अध्ययन के लिए भेजने की तैयारी है। सर्वे के दौरान झील के जलस्तर और आकार में बदलाव, आसपास की भौगोलिक स्थिति और किसी संभावित घटना की स्थिति में नीचे के क्षेत्रों पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। इसमें सेंसर, जलस्तर मापने वाले उपकरण, रियल टाइम डेटा संग्रह और अर्ली वार्निंग सिस्टम जैसी व्यवस्थाओं को विकसित करने पर जोर दिया गया है, ताकि असामान्य बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सके।

सरकार ऐसे इलाकों की पहचान भी करेगी, जो किसी ग्लेशियर झील से जुड़ी आपदा की स्थिति में प्रभावित हो सकते हैं। इन क्षेत्रों के लिए सुरक्षित निकासी मार्ग, स्थानीय स्तर पर चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था और राहत-बचाव से जुड़े संसाधनों को पहले से तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।

आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, नेपाल में आई बाढ़ के बाद जिलाधिकारियों के साथ राज्य की तैयारियों की समीक्षा की गई। बैठक में ग्लेशियर झीलों के अलावा नदियों के जलस्तर, संवेदनशील क्षेत्रों, संचार व्यवस्था, त्वरित राहत पहुंचाने की तैयारी और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों की स्थिति पर भी चर्चा हुई।

राज्य सरकार का जोर अब केवल खतरे की पहचान तक सीमित न रखकर समय रहते चेतावनी और स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया व्यवस्था मजबूत करने पर है। अधिकारियों को चिह्नित क्षेत्रों की नियमित निगरानी करने और किसी भी असामान्य बदलाव की जानकारी तुरंत आपदा प्रबंधन तंत्र तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।

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