उत्तराखंड की इस हिमालयी झील में लगा पहला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, आपदा का खतरा बढ़ते ही जारी होगा अलर्ट

चमोली के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में लगे नए सेंसर झील के जलस्तर, बर्फ, मौसम और जमीन की हलचल पर नजर रखेंगे। सैटेलाइट के जरिए आपदा प्रबंधन एजेंसियों तक जानकारी पहुंचने से संभावित ग्लेशियल बाढ़ के खतरे का समय रहते आकलन करने में मदद मिलेगी।
Three-panel photographic collage showing the installation of a solar-powered early warning system at Vasundhara Tal glacial lake in Chamoli, including field technicians, monitoring sensors and the completed station.

देहरादून, 14 अक्टूबर। चमोली जिले के वसुधारा ताल में ग्लेशियल झील से अचानक बाढ़ के खतरे की समय रहते जानकारी देने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया गया है। करीब 4,800 मीटर यानी लगभग 15,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील में लगाए गए सेंसर जलस्तर, मौसम और आसपास की भू-गतिविधियों की निगरानी करेंगे।

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) की पहल पर केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने यह सिस्टम स्थापित किया है। यह उत्तराखंड की किसी ग्लेशियल झील में लगाया गया पहला सेंसर आधारित Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) Early Warning System है।

CBRI के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार वसुधारा ताल करीब 38.5 मीटर गहरा, 900 मीटर लंबा और 600 मीटर चौड़ा है। झील की मौजूदा स्थिति की निगरानी के लिए यहां पानी के ऊपर और अंदर अलग-अलग सेंसर लगाए गए हैं।

सिस्टम के जरिए झील के जलस्तर के साथ हवा की गति और दिशा, तापमान, बारिश, वायुदाब, बर्फ की स्थिति और जमीन में होने वाली हलचल की जानकारी जुटाई जाएगी। इसके लिए floating और submerged water-level sensors के साथ accelerometer और tilt sensor जैसे उपकरण लगाए गए हैं।

सामान्य स्थिति में सिस्टम हर दो घंटे में डेटा CBRI रुड़की और USDMA के डैशबोर्ड पर भेजेगा। किसी असामान्य स्थिति या खतरे के संकेत मिलने पर जानकारी तुरंत संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाई जा सकेगी।

वसुधारा ताल क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण डेटा भेजने के लिए Iridium satellite communication का इस्तेमाल किया जा रहा है। सिस्टम को solar power और battery backup से भी जोड़ा गया है।

ऊंचाई पर तेज हवाओं को देखते हुए उपकरणों के लिए तैयार foundation को करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवा सहने के हिसाब से डिजाइन किया गया है। सिस्टम को ऐसे स्थान पर लगाया गया है जहां भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा अपेक्षाकृत कम माना गया है।

National GLOF Risk Mitigation Programme के तहत किए गए इस अभियान में CBRI और वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ SDRF, NDRF और ITBP ने भी सहयोग किया।

NRSC के 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें 13 झीलें high-risk category में हैं और पांच को very high-risk माना गया है। वसुधारा ताल भी इन्हीं अधिक जोखिम वाली झीलों में शामिल है।

GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जब किसी ग्लेशियल झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकल जाता है। झील को रोककर रखने वाली बर्फ, मलबे या प्राकृतिक बांध जैसी संरचना टूटने पर पानी तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह सकता है। इससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़, मलबे और भारी नुकसान का खतरा पैदा हो सकता है।

हाल में नेपाल में हुई भीषण बाढ़ ने भी हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह के खतरों को लेकर चिंता बढ़ाई है। 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ के पीछे ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर के हिस्से और चट्टानों के टूटकर गिरने तथा नदी का रास्ता अस्थायी रूप से रुकने जैसी घटनाओं की भूमिका सामने आई थी। घटना के सही कारणों को लेकर जांच हुई, जिसमें GLOF या उससे मिलती-जुलती high-altitude outburst घटना की आशंका भी जताई गई। इस बाढ़ ने नेपाल में बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया।

नेपाल की इस घटना के बाद उत्तराखंड सरकार ने भी संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी तेज करने का फैसला किया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपदा प्रबंधन विभाग को ऐसी झीलों का वैज्ञानिक सर्वे करने, जलस्तर और आकार में बदलाव की नियमित निगरानी करने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश दिए थे।

वसुधारा ताल में लगाए गए सिस्टम का उद्देश्य भी झील में होने वाले असामान्य बदलावों को समय रहते पहचानना और संबंधित आपदा प्रबंधन एजेंसियों को पहले चेतावनी देना है, ताकि खतरे की स्थिति में निचले इलाकों में समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें।

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