उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल में भू-धंसाव, कई जगह बनी खाइयां; वन विभाग ने शुरू किया निरीक्षण

दयारा बुग्याल के निचले हिस्सों में घास और वनस्पतियों पर बढ़ते दबाव ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ाई है। पर्यटन और पशु चराई से आजीविका जुड़े होने के कारण संरक्षण के उपायों में पर्यावरण और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण होगा।
Documentary-style view of Dayara Bugyal in Uttarkashi showing localised erosion gullies, exposed soil and thinning alpine grass cover.

उत्तरकाशी, 15 अक्टूबर। उत्तरकाशी का प्रसिद्ध दयारा बुग्याल इन दिनों पर्यावरणीय दबाव को लेकर चर्चा में है। बुग्याल के कुछ हिस्सों में भू-धंसाव और भूस्खलन के कारण खाइयां बनने की स्थिति सामने आई है। निचले क्षेत्रों में बुग्याली घास कम दिखाई देने की बात भी स्थानीय लोग कह रहे हैं।

दयारा बुग्याल के घास के मैदानों और यहां मिलने वाली वनस्पतियों पर असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बढ़ते पर्यटन और मवेशियों के चरने से भी बुग्याल पर दबाव बढ़ रहा है।

स्थानीय निवासी यजवेंद्र रावत के अनुसार दयारा में पर्यटन लोगों की आजीविका का अहम जरिया है, लेकिन इसे व्यवस्थित तरीके से चलाने की जरूरत है। उनका कहना है कि अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो घास के मैदानों, फूलों और दूसरी वनस्पतियों पर असर और बढ़ सकता है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक दयारा बुग्याल के निचले हिस्सों में पहले जैसी घनी घास कई जगह अब कम दिखाई देती है। बेहतर घास वाले बड़े मैदान देखने के लिए पर्यटक अब सूर्याटॉप और देवकुंड जैसे ऊपरी क्षेत्रों की ओर भी जा रहे हैं।

दयारा बुग्याल करीब 2,600 से 3,500 मीटर की ऊंचाई पर फैला है और उत्तरकाशी के प्रमुख ट्रैकिंग स्थलों में शामिल है। सर्दियों में बर्फबारी के बाद यहां ट्रैकिंग और स्कीइंग के लिए भी पर्यटक पहुंचते हैं।

बुग्याल की स्थिति को देखते हुए वन विभाग ने भी निरीक्षण शुरू किया है। रेंज अधिकारी शेखर राणा के अनुसार क्षेत्र की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है और संरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजी जा रही है।

मंजूरी मिलने के बाद बुग्याल के संवेदनशील हिस्सों और यहां की वनस्पतियों को बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल स्थानीय लोग पर्यटन गतिविधियों को व्यवस्थित करने और मवेशियों के दबाव को नियंत्रित करने की मांग कर रहे हैं।

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