बंजर होते खेत: खेती क्यों छूट रही है

क्या आप जानते हैं, पहाड़ों में हरे-भरे दिखने वाले कई खेत अब खाली क्यों पड़ने लगे हैं? ये लेख पलायन, बदलते मौसम और खेती से टूटते रिश्ते के पीछे छिपे उस बदलाव के बारे में है, जो धीरे-धीरे पूरे पहाड़ी जीवन को बदल रहा है।
बंजर होते खेत उत्तराखंड के खाली पड़ते सीढ़ीदार खेत

एक समय था जब पहाड़ के खेतों में रौनक रहती थी।
चाहे बोआई का समय हो या कटाई का, हर मौसम के साथ खेतों में लोगों की आवाजाही बनी रहती थी।
सुबह की शुरुआत अक्सर खेतों की ओर ही होती थी, और दिन का एक बड़ा हिस्सा उसी मिट्टी में बीतता था।
कहीं हल चल रहा होता,
कहीं बीज डाले जा रहे होते,
और कहीं फसल कट चुकी होती।
यह केवल काम नहीं था, बल्कि एक जीवन-चक्र था, जो बिना लिखे पीढ़ियों से चलता आ रहा था।

लेकिन अब वही खेत धीरे-धीरे शांत हो गए हैं।
जहाँ कभी लोगों की आवाजें गूंजती थीं, वहाँ अब सन्नाटा ज्यादा महसूस होता है।
मैं जब आज उन खेतों की तरफ जाता हूँ,
तो मुझे वहाँ काम से ज्यादा
खालीपन दिखाई देता है।

इसके पीछे कारण केवल एक नहीं है।
सबसे पहला बदलाव समय के साथ आया।
पुरानी पीढ़ी, जो इन खेतों को समझती थी, धीरे-धीरे खत्म हो गई।
और जो बचे, उनमें से कई
उम्र या परिस्थितियों के कारण
अब उतने सक्षम नहीं रहे।

दूसरा बड़ा कारण लोगों का जाना है।
पहाड़ से शहर की ओर धीरे-धीरे पलायन बढ़ा, और जो लोग खेतों को जानते थे, जो मौसम और मिट्टी की पहचान रखते थे, वही लोग अब वहाँ नहीं हैं।
खेती केवल जमीन पर नहीं होती,
वह लोगों के अनुभव, उनकी समझ
और उनकी मौजूदगी पर भी निर्भर करती है।

जब ये तीनों चीजें कम होने लगती हैं,
तो खेत अपने आप छूटने लगते हैं।
यह किसी एक दिन का फैसला नहीं होता,
बल्कि धीरे-धीरे बनता हुआ बदलाव होता है।

Read also : ऊपर चमकते हिमखंड, नीचे बहती ज़िंदगी

एक और कारण मौसम का बदलना है।
पहले बारिश का समय कुछ हद तक तय होता था, और खेती का पूरा चक्र उसी के अनुसार चलता था।
अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा।
कभी बारिश समय से पहले आ जाती है,
कभी बिल्कुल नहीं आती,
और कभी इतनी होती है
कि फसल ही खराब हो जाती है।

इस अनिश्चितता में खेती,
जो पहले ही कठिन थी,
और कठिन हो गई है।

पहाड़ की खेती हमेशा से मेहनत वाली रही है।
सीढ़ीदार खेत, कम जगह और ज्यादा श्रम इसमें शामिल रहे हैं।
लेकिन अब उसी मेहनत के बदले
परिणाम पहले जैसे नहीं मिलते।

ऐसे में धीरे-धीरे लोगों ने खेती छोड़नी शुरू कर दी।
जो खेत कभी हरे दिखाई देते थे,
वे अब बंजर नजर आने लगे।

कुछ जगहों पर घास उग आई,
कुछ जगहों पर झाड़ियाँ फैल गईं,
और कहीं-कहीं जंगल वापस आने लगा।
मैंने कई ऐसे खेत देखे हैं,
जहाँ कभी फसल होती थी,
और अब वहाँ सिर्फ जंगली घास खड़ी है।

यह बदलाव केवल खेती का नहीं है।
यह एक पूरे जीवन-तंत्र का धीरे-धीरे बदलना है।
जब खेत खाली होते हैं,
तो सिर्फ फसल नहीं जाती।
उसके साथ जुड़ी आदतें जाती हैं,
ज्ञान जाता है,
और एक पूरी पीढ़ी का अनुभव
धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।

आज खेत अब भी हैं।
मिट्टी भी वही है।
लेकिन उन पर काम करने वाले हाथ
कम हो गए हैं।
और शायद यही सबसे बड़ा बदलाव है।

मैं जब उन खेतों को देखता हूँ,
तो मुझे सिर्फ खाली जमीन नहीं दिखती,
बल्कि वह सब याद आता है
जो कभी वहाँ हुआ करता था।

शायद इसलिए
बंजर होते खेत सिर्फ खाली जमीन नहीं होते,
वे एक बदलते जीवन का संकेत होते हैं।फिर भी, जो लोग आज भी अपने खेतों को जिंदा रखे हुए हैं,
वे सिर्फ खेती नहीं कर रहे,
वे उस रिश्ते को बचाए हुए हैं
जो इंसान और मिट्टी के बीच कभी अपने आप बना था।

Read also : पहाड़ों में बदलती राहें: पलायन से संभावना तक