फोन में यूट्यूब पर नरेंद्र सिंह नेगी जी का गाना चल रहा था,
“ना दौड़, ना दौड़ ते उंदारी का बाटा…”
यह गाना मुझे बेहद पसंद है,
क्योंकि मैं भी शायद उन्हीं लोगों में से हूँ
जो अपने पहाड़ वापस जाना तो चाहते हैं,
लेकिन वह हर दिन का एक प्रयास बनकर रह जाता है।
ऐसा लगता है
कि यह इच्छा कभी न कभी पूरी होगी,
लेकिन सच में यह उस पर्वत की तरह है
जो हर दिन दिखाई देता है,
पर उस पर चढ़ना
एक बड़ा निर्णय बन जाता है।
यही सब सोचते हुए
जब मैं इस गाने के कमेंट्स सेक्शन तक पहुँचा,
तो नेगी जी की तारीफ
मानो एक तय शुरुआत की तरह थी,
जो उनके हर गीत में मिल ही जाती है।
लेकिन
उन कमेंट्स के बीच
कुछ ऐसी बातें भी थीं,
जिन्हें पढ़कर लगा
कि मैं अकेला नहीं हूँ।
इन सभी कमेंट्स को पढ़कर
लोगों की अलग-अलग बातों में भी
एक ही भावना दिखाई दे रही थी—
कि अब
गाँव धीरे-धीरे
खाली होते जा रहे हैं।
कहीं यह बात
सीधे शब्दों में लिखी थी,
तो कहीं
बस कुछ अधूरी पंक्तियों में छुपी हुई थी—
घर बंद पड़े हैं,
दरवाजे अब कम खुलते हैं।
और कुछ लोगों की बातों में
एक उम्मीद भी थी,
कि अभी तो मजबूरी है,
लेकिन कभी न कभी
वापस लौटना है
अपने पहाड़।
और यह “कभी”
किसी तारीख का नहीं,
एक उम्मीद जैसा लगता है।
मैं हैरान नहीं था क्योंकि
जो लोग लिख रहे थे वही
मैं पहले देख चुका था
और शायद इसी वजह से
यह सिर्फ कमेंट्स नहीं थे।
यह सच था।
एक समय ऐसा भी आता है
जब पहाड़ और पहाड़ों में अपना वो घर
धीरे-धीरे
अपने ही लोगों से खाली होने लगता है।
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शुरुआत हमेशा छोटी होती है।
“पढ़ाई के लिए जाना है”
“काम के लिए निकलना है”
लेकिन यहीं से दूरी की
शुरुआत हो जाती है।
गाँव वैसा ही रहता है।
घर भी वैसा ही खड़ा रहता है।
दरवाजे, आँगन, दीवारें
कुछ भी नहीं बदलता।
बदलते हैं तो सिर्फ लोग
और उनका वहाँ होना।
पहले सिर्फ आना-जाना कम होता है,
और फिर गाँव में रुकना कम हो जाता है।
और एक समय ऐसा आता है
जब घर का खुलना ही कम हो जाता है।
दरवाजे बंद नहीं होते लेकिन
उन पर दस्तक कम हो जाती है।
त्योहार आते हैं लेकिन भीड़
अब पहले जैसी नहीं आती।
आँगन वही रहता है लेकिन
बैठने वाले कम हो जाते हैं।
शहर जाना सिर्फ जगह बदलना नहीं होता।
यह जीवन की दिशा बदलना होता है।
गाँव में हर रास्ता जाना-पहचाना होता है।
किस मोड़ पर कौन मिलेगा,
यह अंदाज़ा नहीं, यकीन होता है।
शहर में पता होते हुए भी
लोग अजनबी रहते हैं।
चेहरे दिखते हैं लेकिन
उनमें अपनापन नहीं बसता।
गाँव से शहर जाने वाला
सिर्फ अपना सामान नहीं ले जाता।
वह अपने साथ यादें ले जाता है,
आदतें ले जाता है
और कुछ अधूरी बातें भी।
और पीछे क्या छूटता है,
यह तुरंत समझ नहीं आता।
यह एहसास धीरे-धीरे आता है,
जब लौटने पर घर वैसा ही होता है
लेकिन जीवन वैसा नहीं रहता।
और इसी बदलाव को नेगी जी
के गीत की ये पंक्तियाँ
क्या ही सटीक ढंग से समझाती हैं
“ऐंच गौमुखमा ज्वा गंगा पवित्र
उंन्दार्योमा दनिकी कौजाव ह्वेगी
गद्निन्यो मां मिलिगे ज्यु ह्यु उंन्द बौगी
जू रैगे हिमालैमा वीं चमकुणु चा”
ऊपर गौमुख में जो गंगा
पवित्र, निर्मल और साफ है,
वह नीचे की ओर बहते हुए
धीरे-धीरे मैली होती जाती है।
जो बर्फ के टुकड़े हिमखंडों से पिघल गए,
वे पानी बनकर नीचे गदेरों में मिलते हुए बह गए।
और जो हिमखंड ऊपर हिमालय में
बचे रह गए, वही अब भी चमक रहे हैं।
शायद यही पहाड़ की कहानी भी है।
जो लोग नीचे चले गए,
वे जीवन में आगे बढ़ गए,
लेकिन अपने मूल से दूर हो गए।
शहर में सब कुछ मिल जाता है,
लेकिन वह नहीं मिलता
जो बिना खोजे अपने आप
मिल जाता था।
कभी-कभी वापस आने का मन होता है,
लेकिन वापस आना उतना आसान नहीं होता
जितना सोच लेना, क्योंकि अब जीवन
कहीं और बस चुका होता है।
और गाँव वहीं रहता है।
न इंतज़ार करता है,
न शिकायत करता है।
लेकिन यादों में हमेशा बना रहता है।
शायद इसलिए गाँव से शहर जाना
सिर्फ जाना नहीं होता।
यह धीरे-धीरे अपने घर से
दूर हो जाने की एक
लंबी प्रक्रिया होती है।
और पहाड़
वह वहीं रहता है।
चुपचाप।
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