पिरूल से पहचान: द्वाराहाट की महिलाओं ने हस्तशिल्प के जरिए बनाया स्वरोजगार का रास्ता

पहाड़ों में रोजगार की कमी और पलायन के बीच यह पहल दिखाती है कि स्थानीय संसाधन भी आजीविका का मजबूत आधार बन सकते हैं। द्वाराहाट की महिलाओं ने जिस पिरूल को कभी बेकार समझा जाता था, उसी को हुनर और मेहनत से पहचान, आमदनी और दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा में बदल दिया।
Women from the Maa Dunagiri Pirul Group in Dwarahat display handcrafted baskets and decorative products made from pine needles during community activities, exhibitions and training sessions.

अल्मोड़ा के द्वाराहाट क्षेत्र में महिलाओं का एक समूह चीड़ के पिरूल से उपयोगी और सजावटी उत्पाद तैयार कर रहा है। हॉट केस, टोकरियां, फूलदान और दूसरे हस्तशिल्प उत्पाद बनाकर इन महिलाओं ने गांव में ही आमदनी का एक साधन तैयार किया है और अपने काम को स्थानीय बाजारों से बाहर तक पहुंचाया है।

द्वाराहाट के असगोली और झुरिया गांव की महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह के जरिए ‘मां दूनागिरी पिरूल समूह’ बनाया है। समूह से जुड़ी महिलाएं पिरूल से रोजमर्रा के उपयोग और घर की सजावट से जुड़े कई तरह के उत्पाद बनाती हैं।

समूह की सदस्य ममता अधिकारी के अनुसार, शुरुआत में महिलाओं को यह अंदाजा नहीं था कि पिरूल से तैयार सामान लोगों को पसंद आएगा और इससे कमाई भी हो सकेगी। समूह की एक महिला प्रशिक्षण लेकर लौटी तो बाकी महिलाओं ने भी यह काम सीखना शुरू किया। उस समय उनका मकसद बाजार के लिए उत्पाद तैयार करना नहीं, बल्कि घर की सजावट के लिए कुछ सामान बनाना था।

काम सीखने के बाद महिलाओं ने अलग-अलग उत्पाद तैयार करने शुरू किए। धीरे-धीरे उनके बनाए सामान की मांग बढ़ी और घर से शुरू हुआ यह काम आमदनी के एक छोटे साधन में बदल गया। इसके बाद महिलाओं ने अपने उत्पाद स्थानीय बाजारों, मेलों और प्रदर्शनियों तक पहुंचाने शुरू किए।

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समूह की सदस्य सोनिका अधिकारी के मुताबिक महिलाएं मांग के अनुसार हॉट केस, फूलदान, कटोरे, प्लेट, टोकरियां, पेन स्टैंड और राखियां बनाती हैं। इन उत्पादों की कीमत करीब 200 रुपये से शुरू होती है। पिरूल के सामान के अलावा समूह की महिलाएं ऐपण कला और बुनाई का काम भी करती हैं।

समूह के उत्पाद स्थानीय बाजारों के साथ कैंची धाम और रानीखेत जैसे पर्यटन स्थलों तक भी पहुंचाए जा रहे हैं। महिलाएं अल्मोड़ा, रानीखेत, देहरादून और कोसी सहित अलग-अलग स्थानों पर स्टॉल लगा चुकी हैं। समूह से जुड़ी महिलाएं अब दूसरी महिलाओं को भी हस्तशिल्प का प्रशिक्षण देती हैं।

समूह की शुरुआत पांच महिलाओं ने की थी। अब इससे करीब 10 से 12 महिलाएं जुड़ चुकी हैं। समूह की सदस्य मंजू के अनुसार, शुरुआती समय में लोग उनके काम का मजाक उड़ाते थे और पिरूल से सामान बनाने को समय की बर्बादी मानते थे। बाद में जब उत्पादों को पहचान मिली तो दूसरी महिलाओं की रुचि भी इस काम में बढ़ी।

पिरूल से एक उत्पाद तैयार करने में दो से तीन दिन तक लग सकते हैं। समूह की सदस्य ज्योति अधिकारी का कहना है कि कई बार महिलाओं को उनकी मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिलती। इस कारण शुरुआत में कुछ महिलाएं निराश भी हुईं, लेकिन उन्होंने काम जारी रखा।

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इस काम से महिलाओं को केवल आमदनी ही नहीं मिली, बल्कि गांव से बाहर निकलकर बाजार और दूसरे लोगों से जुड़ने का मौका भी मिला। घर और खेती की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपने हुनर को काम में बदला और अपने लिए एक अलग पहचान बनाई।

समूह की सदस्य पूजा अधिकारी के अनुसार, पहले गांवों में खेती से परिवारों का गुजारा हो जाता था, लेकिन मानव-वन्यजीव संघर्ष और दूसरी समस्याओं के कारण पहाड़ों में खेती करना कठिन हुआ है। ऐसे में हस्तशिल्प और स्वरोजगार गांव में ही काम का विकल्प दे सकते हैं।

उनका मानना है कि इस तरह के काम को बढ़ावा मिलने से गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और पलायन कम करने में भी मदद मिल सकती है। मां दूनागिरी पिरूल समूह की महिलाओं ने सीमित साधनों के बीच अपने हुनर को आमदनी से जोड़ा है और दूसरी महिलाओं के सामने भी स्वरोजगार का एक रास्ता रखा है।

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