पारंपरिक मंडुवे से आधुनिक कारोबार: कल्पना बिष्ट ने गांव में तैयार किया रोजगार का नया मॉडल

उत्तराखंड के पारंपरिक मंडुवे की असली क्षमता केवल खेती तक सीमित नहीं है। सही प्रशिक्षण, बेहतर पैकेजिंग और बाजार से जुड़ने पर यही स्थानीय अनाज गांवों में रोजगार, महिला उद्यमिता और टिकाऊ आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है। कल्पना बिष्ट की पहल इसी बदलाव की एक मिसाल है।
Kalpana Bisht stands inside the Swabhiman Mahila Bakery Unit with bakery products prepared from mandua and other local ingredients in Vikasnagar, Uttarakhand.

सोरना डोभरी गांव में कुछ महिलाओं की एक छोटी-सी पहल अब सफल कारोबार का रूप ले चुकी है। जिस काम की शुरुआत सीमित संसाधनों के साथ हुई थी, वही आज स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ने और गांव की महिलाओं को रोजगार देने का माध्यम बन गया है।

देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र के सोरना डोभरी गांव में कल्पना बिष्ट ने पहाड़ के पारंपरिक अनाज मंडुवे को बिस्कुट और दूसरे बेकरी उत्पादों के रूप में बाजार तक पहुंचाया। उन्होंने ‘स्वाभिमान महिला बेकरी यूनिट’ स्थापित की, जो सालाना करीब 40 लाख रुपये का कारोबार कर रही है। इस यूनिट से नौ स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार मिला है।

कल्पना बिष्ट कई सालों से स्वाभिमान महिला क्लस्टर लेवल फेडरेशन से जुड़ी हैं। साल 2024-25 में उन्होंने ग्रामोत्थान यानी रीप परियोजना के सहयोग से करीब 10 लाख रुपये की लागत से बेकरी यूनिट स्थापित की। इसमें परियोजना से छह लाख रुपये की सहायता मिली, तीन लाख रुपये का बैंक ऋण लिया गया और एक लाख रुपये कल्पना ने स्वयं लगाए।

यूनिट में मंडुवे के बिस्कुट के साथ गुड़-मक्खन बिस्कुट, हनी ओट्स बिस्कुट, मिल्क रस्क और स्थानीय अनाजों से बने दूसरे उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। इनमें से कुछ उत्पाद ‘हाउस ऑफ हिमालय’ के माध्यम से बाजार तक पहुंच रहे हैं। कल्पना पहाड़ी दालों और कच्ची घानी के सरसों तेल से जुड़े कारोबार में भी सक्रिय हैं।

शुरुआत में बेकरी के उत्पाद विकासनगर और देहरादून के आसपास बेचे जाते थे। धीरे-धीरे उनकी मांग बढ़ी और अब आपूर्ति टिहरी तथा उत्तरकाशी तक होने लगी है। उत्पादों को दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए महिला समूह ने एक वाहन भी खरीदा है।

स्वाभिमान महिला बेकरी यूनिट को 38वें राष्ट्रीय खेलों के दौरान भी अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिला। जिला सूचना कार्यालय से साझा जानकारी पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान मंडुवा, झंगोरा, गुड़-मक्खन और शहद से तैयार करीब 27 क्विंटल उत्पाद बेचे गए। इससे लगभग 10 लाख रुपये की आय हुई।

इस पहल का असर केवल कारोबार तक सीमित नहीं है। यूनिट में काम करने वाली नौ महिलाओं को अपने क्षेत्र में ही नियमित कमाई का अवसर मिला है। घर और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ काम करने वाली इन महिलाओं के लिए यह बेकरी आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपनी अलग पहचान बनाने का माध्यम बनी है।

पारंपरिक अनाजों को बाजार के अनुरूप पैकेजिंग में पेश करना भी इस यूनिट की पहचान का हिस्सा है। फैशन डिजाइनिंग का अनुभव रखने वाली कल्पना उत्पादों की पैकेजिंग तैयार करने में भी भूमिका निभाती हैं। इससे स्थानीय उत्पादों को आधुनिक बाजार में बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में मदद मिली है।

कल्पना बिष्ट के अनुसार, साल 2021 में उनके महिला समूह को पांच लाख रुपये की सहायता मिली थी। इस राशि का उपयोग मार्केटिंग और पैकेजिंग को बेहतर बनाने में किया गया।

उत्तराखंड के घरों में लंबे समय से रोटी के रूप में इस्तेमाल होने वाला मंडुवा अब बिस्कुट और दूसरे बेकरी उत्पादों के जरिए नए ग्राहकों तक पहुंच रहा है। कल्पना बिष्ट की पहल बताती है कि स्थानीय अनाजों को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बेहतर पैकेजिंग और बाजार से जोड़ा जाए तो गांव में भी सफल कारोबार खड़ा किया जा सकता है।

मंडुवे से शुरू हुई यह बेकरी आज कल्पना बिष्ट और उनके साथ काम कर रही महिलाओं के लिए केवल कमाई का साधन नहीं रही। यह गांव में रोजगार तैयार करने, स्थानीय उत्पादों को नई पहचान देने और महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने का एक मजबूत उदाहरण बन चुकी है।

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