उत्तराखंड हाईकोर्ट के प्रस्तावित नए परिसर के लिए गौलापार की जमीन छह सप्ताह में सौंपने के निर्देश

एक अदालत का नया परिसर केवल निर्माण परियोजना नहीं होता। इसके पीछे कई प्रशासनिक, पर्यावरणीय और संस्थागत प्रक्रियाएं जुड़ी होती हैं, जिनका असर आगे की पूरी योजना पर पड़ता है। क्या है पूरा मामला?
The historic Uttarakhand High Court building in Nainital surrounded by deodar trees.

नैनीताल, 15 जुलाई। उत्तराखंड हाईकोर्ट के प्रस्तावित नए परिसर के लिए गौलापार में चिह्नित जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को जमीन का कब्जा छह सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट को सौंपने और भूमि हस्तांतरण से संबंधित अधिसूचना आठ सप्ताह में जारी करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 8 मई 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गौलापार की प्रस्तावित जमीन को स्वीकार करने से इनकार करते हुए दूसरी उपयुक्त जमीन तलाशने के निर्देश दिए गए थे। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के भवन, जमीन, बुनियादी ढांचे और संभावित स्थानांतरण से जुड़े विषयों का समाधान न्यायिक आदेशों के बजाय राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन के बीच विचार-विमर्श से होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने राज्य सरकार को गौलापार की जमीन “जैसी है, जहां है” के आधार पर सौंपने का निर्देश दिया। इसका अर्थ है कि जमीन मौजूदा स्थिति और वहां मौजूद पेड़ों सहित हाईकोर्ट को हस्तांतरित की जाएगी।

सुनवाई के दौरान जमीन पर मौजूद हरियाली और पेड़ों का विषय भी उठा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि हस्तांतरण के दौरान क्षेत्र की हरियाली को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। प्रस्तावित परिसर की आगे की योजना तैयार करते समय पर्यावरणीय जरूरतों और मौजूदा पेड़ों के संरक्षण का ध्यान रखना होगा।

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गौलापार में करीब 26 हेक्टेयर जमीन नए हाईकोर्ट परिसर के लिए चिह्नित की गई थी। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2024 में इस जमीन को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया था कि इसका बड़ा हिस्सा पेड़ों से ढका है और निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ प्रभावित हो सकते हैं।

हाईकोर्ट के उस आदेश में वकीलों और आम लोगों की राय ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से लेने की प्रक्रिया भी प्रस्तावित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को भी रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे प्रशासनिक और संस्थागत विषयों पर निर्णय संबंधित संवैधानिक संस्थाओं और राज्य सरकार के बीच प्रक्रिया के अनुसार लिया जाना चाहिए।

उत्तराखंड हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने सितंबर 2022 में हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित करने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में जमीन चिह्नित की थी। स्थानांतरण के पक्ष में नैनीताल में सीमित स्थान, यातायात दबाव, आवास और संपर्क से जुड़ी समस्याओं जैसे कारण सामने रखे गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट तत्काल नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित हो जाएगा। अभी जमीन का औपचारिक हस्तांतरण, परिसर की योजना, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, निर्माण और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं।

फिलहाल फैसले से गौलापार की चिह्नित जमीन को लेकर बनी कानूनी बाधा दूर हुई है। आगे की कार्रवाई राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन के बीच होने वाली प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

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