उत्तराखंड में 25 वर्षों में विकास परियोजनाओं के लिए 46 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि हस्तांतरित

यह आंकड़ा जंगल कटने का नहीं, बल्कि विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि हस्तांतरित किए जाने का है। जानिए, किन जिलों में सबसे अधिक वन भूमि डायवर्ट हुई, कुल आंकड़ों में अंतर क्यों दिख रहा है और इस डेटा को समझते समय किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
Colour-corrected screengrab showing felled trees and local residents at a forest clearance site in Uttarakhand associated with a development project.

देहरादून, 10 जुलाई। उत्तराखंड में राज्य गठन के बाद पिछले करीब 25 वर्षों में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि हस्तांतरित किए जाने का मामला सामने आया है। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट में यह आंकड़ा 46,203.76 हेक्टेयर बताया गया है।

यह आंकड़ा सीधे तौर पर काटे गए जंगलों या पेड़ों की संख्या नहीं बताता, बल्कि उस वन भूमि से संबंधित है जिसे सड़क, जलविद्युत, खनन, भवन निर्माण और अन्य गैर-वानिकी परियोजनाओं के लिए अलग-अलग विभागों व संस्थाओं को हस्तांतरित या डायवर्ट किया गया।

उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। इसके बाद से राज्य में सड़क संपर्क, बिजली, सिंचाई, सरकारी भवनों, पर्यटन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विस्तार हुआ। ऐसी परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग की स्थिति में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत स्वीकृति जरूरी होती है।

RTI के तहत उपलब्ध जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, देहरादून में सबसे अधिक 21,618.32 हेक्टेयर वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई। इसके बाद हरिद्वार में 6,002.32 हेक्टेयर, नैनीताल में 3,603.83 हेक्टेयर, चमोली में 3,065.34 हेक्टेयर, टिहरी में 2,555.29 हेक्टेयर और पिथौरागढ़ में 2,360.67 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई।

वहीं उत्तरकाशी में 1,389.83 हेक्टेयर, पौड़ी में 1,344.30 हेक्टेयर, अल्मोड़ा में 1,266.62 हेक्टेयर, चंपावत में 1,046.55 हेक्टेयर, रुद्रप्रयाग में 852.78 हेक्टेयर, बागेश्वर में 326.23 हेक्टेयर और ऊधम सिंह नगर में 271.09 हेक्टेयर वन भूमि विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित की गई।

इन 13 जिलों का कुल योग 45,703.17 हेक्टेयर बनता है, जबकि RTI आधारित रिपोर्ट में कुल हस्तांतरित वन भूमि 46,203.76 हेक्टेयर बताई गई है। दोनों आंकड़ों में लगभग 500.59 हेक्टेयर का अंतर है। रिपोर्ट में इस अंतर का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है। इसलिए कुल आंकड़ा RTI आधारित रिपोर्ट के अनुसार और जिलेवार आंकड़े उपलब्ध चार्ट के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं।

वन भूमि हस्तांतरण का मतलब यह नहीं होता कि संबंधित पूरे क्षेत्र के सभी पेड़ काट दिए गए। परियोजना की प्रकृति और मंजूरी की शर्तों के अनुसार भूमि के किसी हिस्से में पेड़ों का कटान, सड़क निर्माण, बिजली लाइन, भवन या अन्य संरचना विकसित की जा सकती है। इसलिए इस आंकड़े को सीधे “46 हजार हेक्टेयर जंगल कटने” के रूप में पेश करना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।

विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के बढ़ते उपयोग ने पर्यावरण संतुलन को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखंड भूस्खलन, भू-कटाव और आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से बड़ी परियोजनाओं के संचयी प्रभाव का आकलन करने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।

दूसरी ओर, सरकार और परियोजना एजेंसियां सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को जरूरी बताती हैं। वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की मंजूरी के साथ प्रतिपूरक वनीकरण, नेट प्रेजेंट वैल्यू और अन्य पर्यावरणीय शर्तें भी लागू की जाती हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सामने आया आंकड़ा विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित वन भूमि से जुड़ा है। इसलिए खबर में “जंगल काटे गए” के बजाय “वन भूमि हस्तांतरित” या “गैर-वानिकी उपयोग के लिए डायवर्ट” जैसी भाषा अधिक सटीक मानी जाएग

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