देहरादून, 8 अक्टूबर। उत्तराखंड में नया बिजली कनेक्शन लेने की प्रक्रिया 1 नवंबर से बदलने जा रही है। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) ने 150 किलोवाट तक के नए लो-टेंशन (LT) कनेक्शन के लिए पहले से तय शुल्क की व्यवस्था लागू करने का आदेश जारी किया है। इसके बाद हर आवेदन के लिए अलग-अलग साइट निरीक्षण और एस्टीमेट तैयार करने की जरूरत कम होगी।
UERC(Uttarakhand Electricity Regulatory Commission) ने 6 अक्टूबर को जारी आदेश में 150 किलोवाट तक के नए LT कनेक्शन के लिए प्री-डिफाइंड चार्ज तय करने की व्यवस्था लागू की है। यह व्यवस्था Electricity (Rights of Consumers) Rules, 2020 के Rule 4(13) के तहत की गई है।
नई व्यवस्था विद्युतीकृत क्षेत्रों में लागू होगी। इसके तहत कनेक्शन के लोड और मौजूदा बिजली लाइन से दूरी के आधार पर शुल्क पहले से निर्धारित रहेगा। इससे उपभोक्ता को आवेदन करने के बाद अलग से एस्टीमेट तैयार होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
अब तक कई मामलों में नया कनेक्शन देने से पहले विभाग की ओर से मौके का निरीक्षण किया जाता था। बिजली लाइन की दूरी, नए पोल या लाइन की जरूरत और अन्य काम का आकलन करने के बाद उपभोक्ता के लिए अलग एस्टीमेट तैयार किया जाता था।
नई व्यवस्था में मौजूदा बिजली लाइन से परिसर की दूरी 300 मीटर तक होने पर निर्धारित शुल्क लिया जाएगा। इस सीमा तक अलग-अलग उपभोक्ताओं के लिए लाइन विस्तार का अलग एस्टीमेट तैयार करने की जरूरत नहीं होगी।
यदि किसी उपभोक्ता का परिसर मौजूदा बिजली लाइन से 300 मीटर से अधिक दूरी पर है, तो 300 मीटर तक निर्धारित शुल्क लागू होगा। इसके बाद अतिरिक्त दूरी के लिए होने वाले खर्च की जानकारी विभाग की ओर से अलग से दी जाएगी।
300 मीटर से अधिक दूरी वाले मामलों में अतिरिक्त खर्च का आकलन कर उपभोक्ता को निर्धारित समय के भीतर जानकारी देनी होगी। इससे आवेदन के बाद कनेक्शन पर आने वाले खर्च को लेकर स्थिति पहले के मुकाबले अधिक स्पष्ट होगी।
नई व्यवस्था 150 किलोवाट तक के LT कनेक्शन पर लागू होगी। इसमें घरेलू के साथ ऐसी अन्य श्रेणियां भी शामिल होंगी जो इस लोड सीमा के भीतर आती हैं।
UERC के आदेश के अनुसार नया सिस्टम 1 नवंबर 2026 से लागू होगा। इसका उद्देश्य नए बिजली कनेक्शन जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना और हर आवेदन में अलग-अलग निरीक्षण तथा एस्टीमेट पर निर्भरता कम करना है।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद उपभोक्ताओं को कनेक्शन के लिए लगने वाले शुल्क का अंदाजा पहले से मिल सकेगा। वहीं 300 मीटर तक के मामलों में अलग एस्टीमेट तैयार करने की प्रक्रिया कम होने से नया कनेक्शन मिलने में लगने वाला समय भी घट सकता है।
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