एक समय था, जब पहाड़ में न चिट्ठी हर बार पहुँच पाती थी
और न फोन जैसा कोई साधन था…
तब खबर पहुँचाने का
एक अलग तरीका हुआ करता था।
पहाड़ के जीवन में “खबर”
कभी अचानक नहीं पहुँचती थी।
वह चलकर आती थी—
किसी के साथ, किसी रास्ते से
और किसी भरोसे के साथ।
इसी प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में
“रैबार” कहा जाता था।
रैबार का अर्थ केवल सूचना देना
भर नहीं था।
यह एक ऐसा संचार तंत्र था,
जो बिना किसी लिखित व्यवस्था के चलता
और बिना किसी तकनीक के भी काम करता।
यह केवल लोगों और उनके आपसी
संपर्क पर आधारित होता था।
जब गाँवों के बीच सड़कें नहीं थीं
और संचार के साधन सीमित थे,
तब किसी भी सूचना को
एक स्थान से दूसरे स्थान तक
इसी व्यवस्था से पहुँचाया जाता था।
चाहे वह शादी की खबर हो,
बीमारी की सूचना हो
या किसी जरूरी बुलावे की बात।
रैबार किसी एक व्यक्ति का काम
नहीं होता था।
यह एक सामूहिक समझ पर आधारित
प्रणाली के रूप में काम करता था।
यदि किसी को दूसरे गाँव में
खबर भेजनी होती,
तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को
संदेश दे देता,
जो उसी दिशा में जा रहा होता।
वह व्यक्ति उस संदेश को
अपने साथ लेकर चलता।
रास्ते में अगर कोई और व्यक्ति
उसी दिशा में मिलता,
तो संदेश उसे सौंप दिया जाता
और वह आगे बढ़ाता।
इस तरह एक सूचना कई हाथों से
गुजरते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचती।
इस व्यवस्था में कोई लिखित प्रमाण
नहीं होता था।
इसलिए संदेश को सही रूप में
याद रखना जरूरी होता था।
लोग छोटे और स्पष्ट वाक्यों में
बात कहते थे,
ताकि अर्थ कहीं बदल न जाए।
रैबार की विश्वसनीयता इसी बात पर
टिकी होती थी,
कि जो सुना गया है,
वही आगे कहा जाए।
इसलिए यह केवल सूचना का आदान-प्रदान
भर नहीं था।
यह विश्वास का आदान-प्रदान भी
साथ में होता था।
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कई बार रैबार केवल सूचना तक
सीमित नहीं रहता था।
इसके साथ भावनाएँ भी जुड़ी
हुआ करती थीं।
संदेश केवल शब्द नहीं होते थे,
उनके साथ बोलने का तरीका भी होता,
आवाज़ का उतार-चढ़ाव भी जुड़ा रहता।
कभी संदेश में जल्दबाज़ी साफ दिखाई
देती थी—
“जल्दी आना है”
“स्थिति गंभीर है”
“तुरंत पहुँचणु जरूरी च”
ऐसे शब्द सुनते ही सामने वाला
बिना पूछे बात समझ लेता।
और कई बार रैबार खुशी लेकर
भी आता था।
“खुशखबरी च”
“ब्यौह माँगियेगी”
“घोर मा पूजा च, संक्वाव आयां”
ऐसे संदेश सुनते ही चेहरे का भाव
तुरंत बदल जाता।
कोई मुस्कुराने लगता,
कोई तुरंत जाने की तैयारी करता
और कोई रास्ते में ही
दूसरों को यह खबर सुनाता।
रैबार में शब्द कम होते थे,
लेकिन अर्थ पूरा पहुँचता था।
क्योंकि जो बात कही जाती थी,
वह केवल सुनी नहीं जाती,
उसे ठीक से समझा भी जाता।
यही कारण था कि बिना लिखे भी
संदेश बदलता नहीं था
और बिना किसी साधन के भी
खबर सही जगह पहुँच जाती।
इस प्रणाली का एक व्यावहारिक पक्ष
भी मौजूद था।
हर व्यक्ति को आसपास के गाँवों,
रास्तों और लोगों की जानकारी होती।
कौन किस दिशा में जाएगा,
कौन कब लौटेगा—
यह सब एक अनौपचारिक समझ का
हिस्सा होता था।
आज जब फोन और इंटरनेट ने
संचार को तुरंत बना दिया है,
तब रैबार जैसी व्यवस्था की
आवश्यकता लगभग समाप्त हो चुकी है।
लेकिन इसे केवल पुरानी व्यवस्था
कहकर छोड़ देना सही नहीं होगा।
यह अपने समय का एक functional
communication system था,
जो बिना किसी तकनीकी साधन के
भी प्रभावी तरीके से काम करता था।
रैबार यह दिखाता है कि संचार
सिर्फ साधनों पर निर्भर नहीं होता।
वह लोगों के बीच बने संबंधों
और भरोसे पर भी टिक सकता है।
और शायद इसी कारण पहाड़ में
“रैबार” केवल एक शब्द नहीं था।
वह एक प्रक्रिया थी,
जिसमें रास्ते, लोग और खबर
तीनों एक साथ चलते थे।
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