देहरादून : एक शहर, जो यादों में अब भी पुराना है

कभी नकरौंदा के आसपास गन्ने के खेत थे, सिटी बसें कम थीं और सोंग नदी गर्मियों की छुट्टियों का सबसे पसंदीदा ठिकाना हुआ करती थी। लगभग दो दशकों में देहरादून बहुत बदल गया, लेकिन कुछ यादें आज भी वहीं खड़ी हैं जहां उन्हें छोड़ा था। इस लेख में उसी पुराने देहरादून का एक स्मृति-सफर।
देहरादून की सड़क पर चलती सिटी बस और आसपास दिखाई देता पुराना शहरी माहौल।

तारीख थी 7 जुलाई 2007। आज से लगभग 19 साल पूर्व, जब मैं पहली बार देहरादून आया था।

देहरादून से मेरी पहली मुलाकात किसी शांत सड़क, सुंदर मौसम या बड़े बाजार से नहीं हुई थी। मेरी पहली याद तो उस सिटी बस से जुड़ी है, जिसमें मैं पहली बार चढ़ा और खड़ा ही रह गया, क्योंकि बैठने की जगह नहीं थी।

हाथ में सामान था, मन में नए शहर को देखने की उत्सुकता थी। बस के अंदर यात्री अपने-अपने सफर में मग्न थे और मैं खिड़की से बाहर झांकते हुए उस देहरादून को पहली बार देख रहा था, जो आज की तरह भागता-दौड़ता नहीं, बल्कि अपनी सहज रफ्तार से चलता था।

क्योंकि उस भीड़ भरी बस से उतरने के बाद इस शहर में मेरा एक नया घर मेरा इंतज़ार कर रहा था। वह घर, जिसकी एक-एक ईंट में मेरे पिताजी की मेहनत जुड़ी हुई थी। शायद उसी घर की ओर जाते हुए मैं अनजाने में अपने जीवन के एक नए अध्याय की ओर भी बढ़ रहा था। उस दिन मुझे केवल नया पता मिला था, लेकिन आने वाले वर्षों में वही पता मेरी सबसे गहरी यादों का हिस्सा बन गया।

देहरादून में जिस जगह मुझे जाना था, उसका नाम बालावाला-नकरौंदा था। उस समय यह इलाका आज की तरह घना बसा हुआ नहीं था। रास्ते में शहर की भागदौड़ पीछे छूटती जाती थी और आगे एक शांत, खुला-खुला सा देहरादून दिखाई देता था।

तब नकरौंदा आज की तरह कंक्रीट का जंगल नहीं था। चारों ओर दूर-दूर तक गन्ने के खेत फैले रहते थे, जिनके बीच से गुजरती संकरी सड़कें इस इलाके को एक अलग पहचान देती थीं। पेड़ों की हरियाली, खुले खेत और गिने-चुने मकानों के कारण यहां गांव जैसा सुकून और अपनापन महसूस होता था। उस समय नकरौंदा में शहरी भागदौड़ की जगह खेतों की खुशबू और प्रकृति की शांति अधिक दिखाई देती थी।

तब नकरौंदा देहरादून का एक छोटा-सा कस्बानुमा इलाका हुआ करता था, जो ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता था। चारों ओर हरियाली और खेत थे, जबकि मकान गिने-चुने ही नजर आते थे। समय के साथ आबादी बढ़ी, बस्तियां फैलीं और आज नकरौंदा नगर निगम क्षेत्र का हिस्सा बन चुका है, जहां पहले की तुलना में काफी बदलाव दिखाई देता है।

तब सड़कें भी काफी संकरी हुआ करती थीं। नकरौंदा से देहरादून शहर जाने के लिए गिनी-चुनी सिटी बसें ही चला करती थीं। आवाजाही सीमित थी, इसलिए शहर तक का सफर भी आज की तुलना में ज्यादा शांत और धीमी रफ्तार वाला महसूस होता था।

तब नकरौंदा में गिनी-चुनी दुकानें ही हुआ करती थीं। जरूरत का सामान भी उन्हीं छोटी दुकानों से मिल जाता था, इसलिए बाजार जैसा शोर नहीं, बल्कि गांव जैसी सहजता महसूस होती थी।

देहरादून के निकट सोंग नदी क्षेत्र में पहाड़ियों की पृष्ठभूमि के बीच चलते हुए लोग।

तब गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी दोस्त सोंग नदी में नहाने जाया करते थे। कभी नहाना होता था, कभी वहीं पिकनिक जैसा माहौल बन जाता था। नदी का ठंडा पानी, आसपास की हरियाली और दोस्तों का साथ उन छुट्टियों को और खास बना देता था।

आज भी सोंग नदी वैसे ही बह रही है, लेकिन अब समय का अभाव है। पहले गर्मियों की छुट्टियों में हम दोस्त नदी में नहाने चले जाते थे, घंटों मस्ती करते थे। अब वही नदी है, वही रास्ते हैं, लेकिन बचपन जैसी फुर्सत और बेफिक्री कहीं पीछे छूट गई है।

देहरादून की पुरानी नीली सिटी बस सड़क पर चलती हुई दिखाई दे रही है।

उस समय गुलरघाटी से प्रेमनगर तक नीले रंग की कुछ ही सिटी बसें चला करती थीं। बसों की संख्या कम थी और उनका इंतजार करना भी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। आसपास के लोगों के लिए बाजार जाने, सामान लाने या शहर के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने का यही सबसे भरोसेमंद साधन हुआ करता था। उस दौर में हर घर में दोपहिया या चारपहिया वाहन नहीं होते थे, इसलिए लोगों की दिनचर्या काफी हद तक इन सिटी बसों के समय पर निर्भर रहती थी। बस आते ही लोग जल्दी-जल्दी चढ़ते और रास्ते भर एक-दूसरे का हालचाल पूछते हुए सफर पूरा करते थे।

बसों में उस समय भी भीड़ रहती थी, लेकिन आज के मुकाबले काफी कम। ज्यादातर लोग सिटी बसों पर ही निर्भर थे, इसलिए सुबह और शाम के समय बसें अक्सर भरी हुई मिलती थीं। फर्क बस इतना था कि सड़कों पर वाहनों की संख्या कम थी। आज लगभग हर घर में दोपहिया या चारपहिया वाहन है, इसलिए लोगों की आवाजाही के तरीके बदल गए हैं। जहां कभी लोग बस के समय का इंतजार करते थे, वहीं अब ज्यादातर लोग अपने साधनों से सफर करना पसंद करते हैं।

मुझे आज भी याद है, साल 2007 में नकरौंदा से घंटाघर तक का बस किराया केवल 6 रुपये हुआ करता था। उस समय 6 रुपये में शहर तक पहुंच जाना अपने आप में बड़ी बात लगती थी। बस का सफर सस्ता था और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का जरूरी हिस्सा भी।

तब क्या ही बात थी इस शहर की। सड़कें भले संकरी थीं, लेकिन जाम नहीं होता था। सफर धीमा जरूर लगता था, मगर थकाने वाला नहीं। आज सड़कें चौड़ी हो चुकी हैं, गाड़ियां भी बढ़ गई हैं, लेकिन उन्हीं सड़कों पर अब जाम ही जाम नजर आता है। शहर आगे तो बढ़ा है, पर वह पुरानी सहजता कहीं पीछे छूट गई है।

चकराता रोड स्थित कुमार स्वीट शॉप का पुराना दृश्य।

जो लोग देहरादून में नए हैं, उन्हें शायद यह बात पता न हो कि चकराता रोड पर कुमार स्वीट शॉप हुआ करती थी। उस समय यह शहर की सबसे चर्चित और पुरानी मिठाई की दुकानों में गिनी जाती थी। देहरादून के बहुत से लोगों की यादों में उसका अपना एक अलग स्थान है। बाद में सड़क चौड़ीकरण के दौरान वह दुकान भी समय के साथ कहीं खो गई। आज वहां से गुजरते हुए नई पीढ़ी को शायद उसका नाम भी न पता हो, लेकिन पुराने देहरादून वालों के लिए कुमार स्वीट शॉप शहर की पहचान का एक हिस्सा थी।

देहरादून स्थित प्रभात सिनेमा हॉल के बाहर जुटी लोगों की भीड़।

और वहीं चकराता रोड से थोड़ा आगे बढ़ते ही प्रभात और कृष्णा पैलेस सिनेमा हॉल कैसे भूल सकता हूं। उस दौर में ये सिर्फ फिल्म देखने की जगह नहीं थे, बल्कि देहरादून की शामों और छुट्टियों की रौनक हुआ करते थे। दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना, टिकट खिड़की पर लाइन लगाना और शो खत्म होने के बाद उसी सड़क पर धीरे-धीरे लौटना, ये सब यादें आज भी मन में ताजा हैं।

आज इनकी जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली है और शहर में मॉल भी खूब खुल गए हैं। अब बाजार, सिनेमा और घूमने-फिरने का तरीका बदल गया है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन पुराने देहरादून की वह सादगी और अपनापन अब यादों में ही ज्यादा मिलता है।

मेरे घर नकरौंदा से भी लगभग दस मिनट की दूरी पर आज एक बड़ा मॉल खुल गया है। यह सोचकर आज भी हैरानी होती है कि जहां कभी घना और सुनसान जंगल हुआ करता था, वहां अब लोगों की भीड़, चमकती रोशनियां और गाड़ियों की कतारें दिखाई देती हैं। समय ने उस जगह का नक्शा ही बदल दिया है। बचपन में जिस इलाके को हम जंगल के रूप में जानते थे, आज वही शहर के सबसे व्यस्त स्थानों में गिना जाता है।

अब इसे समय के साथ बढ़ती आबादी और विकास का ही नाम दिया जा सकता है। शहर बदला, जरूरतें बदलीं और लोगों के रहने-सहने का तरीका भी बदल गया। जहां कभी जंगल, खेत और खुलापन था, वहां आज मकान, मॉल और चौड़ी सड़कें हैं। विकास अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसके साथ पुरानी यादों का छूट जाना भी उतना ही सच है।

इन 19 वर्षों में मैंने इस शहर को बहुत कुछ पाते हुए देखा है, लेकिन इसी सफर में अपनों को खोते हुए भी देखा है। देहरादून बदला, जिंदगी आगे बढ़ी, मगर कुछ चेहरे, कुछ रिश्ते और कुछ पल हमेशा के लिए यादों में रह गए।

इन 19 वर्षों का पता ही नहीं चला। लगता है जैसे कल की ही बात हो, अभी तो मैं देहरादून आया था, कल ही तो स्कूल में एडमिशन कराने गया था। देखते-देखते शहर भी बदल गया और जिंदगी भी।

कभी-कभी सोचता हूं, क्या वाकई समय इतना तेज चल रहा है, या हम ही जिंदगी की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि पीछे मुड़कर देखने का मौका ही नहीं मिला। कल तक जो बातें बचपन लगती थीं, आज वही यादें बनकर साथ चल रही हैं।

तब जिनके कंधों पर स्कूल बैग था, आज उनके कंधों पर जिम्मेदारियां हैं। और जिनके कदम उस समय तेज चला करते थे, अब वे धीरे-धीरे चलते हुए दिखाई देते हैं। समय ने शहर के साथ-साथ हर चेहरे की कहानी भी बदल दी है। और जो तब इस दुनिया में आए भी नहीं थे, वे आज उसी शहर की सड़कों पर अपनी नई यादें बना रहे हैं।

शहर आज काफी विकसित हो चुका है।

लेकिन मानो इस चमकते शहर में कहीं वह पुराना सुकून पीछे छूट गया है।

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