कभी-कभी मुझे लगता है कि मनुष्य को वास्तविक चीज़ों से उतना प्रेम नहीं होता जितना उनके प्रतीकों से होता है।
एक मिट्टी का गणेश हमारे घर में आता है। हम उसे फूल चढ़ाते हैं, उसके सामने दीपक जलाते हैं, उसके लिए विशेष मिठाइयाँ बनती हैं। लेकिन उसी घर के कोने में यदि एक जीवित चूहा दिखाई दे जाए तो सबसे पहले उसे भगाने, पकड़ने या मारने की योजना बनाई जाती है।
शिव मंदिर के बाहर नंदी की मूर्ति के माथे पर लोग तिलक लगाते हैं। उसकी पीठ पर हाथ फेरते हैं, उसके कान में अपनी मनोकामनाएँ कहते हैं। लेकिन वही बैल यदि सड़क पर भूखा खड़ा मिले तो बहुत कम लोग उसके लिए रुकते हैं। कई बार वही बैल ट्रैफिक की समस्या बन जाता है, कई बार उपेक्षा का पात्र।
नाग पंचमी पर नाग देवता को दूध चढ़ाया जाता है। लेकिन यदि किसी खेत, घर या रास्ते में सचमुच का सांप दिखाई दे जाए तो अधिकांश लोगों की पहली प्रतिक्रिया भय और हिंसा होती है।
पहली नज़र में यह विरोधाभास लगता है। लेकिन शायद यह केवल धार्मिक विरोधाभास नहीं है। यह मनुष्य के स्वभाव का एक गहरा सच है।
वास्तविक चीज़ें कठिन होती हैं।
जीवित चूहा गंदगी भी फैलाता है। बैल भूखा भी होता है। सांप काट भी सकता है। जीवित मनुष्य प्रश्न भी पूछता है, असहमति भी जताता है, अपेक्षाएँ भी रखता है। वास्तविक जीवन हमेशा जटिल होता है।
इसके विपरीत प्रतीक सरल होते हैं।
मूर्ति कभी विरोध नहीं करती। पत्थर का नंदी भूख नहीं मांगता। चित्र में बना हुआ नाग किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। प्रतीक हमारे नियंत्रण में रहते हैं। हम उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार सजाते हैं, पूजते हैं और अर्थ देते हैं।
शायद इसलिए मनुष्य को प्रतीकों से प्रेम करना आसान लगता है।
यह बात केवल धर्म तक सीमित नहीं है।
हम राष्ट्रध्वज को सलाम करते हैं, लेकिन कभी-कभी उसी देश के नागरिकों के दुख से उदासीन रहते हैं।
हम “मातृभूमि” के लिए बड़े-बड़े भाषण देते हैं, लेकिन अपने ही शहर की नदी में कूड़ा फेंक देते हैं।
हम “गौ माता” कहते हैं, लेकिन बूढ़ी गायों को सड़कों पर छोड़ देते हैं।
हम “प्रकृति” की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, लेकिन पेड़ कटने पर चुप रह जाते हैं।
समस्या शायद पूजा में नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब प्रतीक वास्तविकता का स्थान लेने लगते हैं।
जब किसी विचार का सम्मान उसके वास्तविक रूप से अधिक होने लगे, तब एक दूरी पैदा होती है। धीरे-धीरे हम उस विचार की मूर्ति तो बचाए रखते हैं, लेकिन उसके अर्थ को खो देते हैं।
धर्म का मूल उद्देश्य भी शायद यही नहीं था।
भारतीय दर्शन में हर जीव में चेतना देखने की बात कही गई। उपनिषदों से लेकर संत परंपरा तक, करुणा को धर्म का आधार माना गया। कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों से अधिक मनुष्य के भीतर झांकने की बात कही। बुद्ध ने किसी प्रतीक की नहीं, बल्कि जीवित प्राणियों के दुःख की चर्चा की।
लेकिन समय के साथ मनुष्य ने विचारों को सरल बनाने के लिए उनके प्रतीक बना लिए।
प्रतीक बुरे नहीं हैं। वे स्मृति को बचाते हैं। वे संस्कृति को आगे ले जाते हैं। वे समाज को एक साझा भाषा देते हैं।
लेकिन यदि प्रतीक ही अंतिम सत्य बन जाएँ, तो वे अपने उद्देश्य से दूर हो जाते हैं।
शायद प्रश्न यह नहीं है कि हम पत्थरों को क्यों पूजते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या हम उसी श्रद्धा का थोड़ा सा हिस्सा जीवित संसार के लिए भी बचाकर रखते हैं?
क्या मंदिर के नंदी को प्रणाम करने वाला हाथ किसी भूखे पशु को रोटी भी दे सकता है?
क्या नाग देवता को दूध चढ़ाने वाला मन किसी जीवित सांप को बिना कारण मारे जाने से बचा सकता है?
क्या गणेश की आरती करने वाला व्यक्ति किसी छोटे जीव के जीवन को भी मूल्यवान मान सकता है?
क्योंकि किसी भी सभ्यता की असली परीक्षा उसके प्रतीकों से नहीं होती।
उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने आसपास मौजूद जीवित संसार के साथ कैसा व्यवहार करती है।
पत्थर की मूर्तियाँ हमारी आस्था का प्रमाण हो सकती हैं।
लेकिन जीवित प्राणियों के प्रति हमारी करुणा ही हमारी मनुष्यता का प्रमाण है।




