देहरादून। बाघ संरक्षण के क्षेत्र में भारत ने दुनिया के सामने मजबूत उदाहरण पेश किया है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2022 रिपोर्ट के अनुसार, देश में बाघों की संख्या 3,682 दर्ज की गई है। यह दुनिया की कुल जंगली बाघ आबादी का करीब 70 प्रतिशत मानी जाती है।
भारत में बाघों की संख्या में यह बढ़ोतरी लंबे समय से चल रहे संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। वैज्ञानिक निगरानी, कैमरा ट्रैप, बेहतर वन प्रबंधन, शिकार पर नियंत्रण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने इस सफलता में अहम भूमिका निभाई है।
देश में बाघों की गणना चार साल के अंतराल पर की जाती है। इस दौरान बाघों की मौजूदगी, उनके आवास, शिकार प्रजातियों और वन क्षेत्रों की स्थिति का विस्तृत आकलन किया जाता है। इसी आधार पर संरक्षण योजनाओं को आगे बढ़ाया जाता है।
भारत में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत अप्रैल 1973 में हुई थी। उस समय देश में केवल नौ टाइगर रिजर्व थे। अब टाइगर रिजर्व का नेटवर्क काफी बढ़ चुका है और बाघ संरक्षण जैव विविधता, जंगलों की सेहत, पर्यटन और स्थानीय आजीविका से भी जुड़ गया है।
सरिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व भारत की संरक्षण यात्रा के अहम उदाहरण हैं। दोनों स्थानों पर एक समय बाघों की आबादी गंभीर संकट में पहुंच गई थी। इसके बाद वैज्ञानिक योजना के तहत बाघों का पुनर्स्थापन किया गया और लगातार निगरानी से इन क्षेत्रों में बाघों की मौजूदगी फिर मजबूत हुई।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण भी सरिस्का और पन्ना में जंगली बाघों के पुनर्स्थापन को भारत की खास उपलब्धियों में गिनता है। इन दोनों रिजर्व की कहानी बताती है कि सही नीति, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय सहयोग से खत्म होती आबादी को फिर से बचाया जा सकता है।
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बाघ शीर्ष शिकारी प्रजाति है। किसी जंगल में बाघ की मौजूदगी उस पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का संकेत मानी जाती है। बाघों की सुरक्षा से जंगल, जल स्रोत, घासभूमि और अन्य वन्यजीवों को भी संरक्षण मिलता है।
हालांकि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। कई क्षेत्रों में बाघ टाइगर रिजर्व से बाहर भी आवाजाही कर रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ती है। ऐसे में सुरक्षित वन्यजीव गलियारों, संवेदनशील क्षेत्रों में जागरूकता और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना जरूरी होगा।
भारत की बाघ संरक्षण यात्रा अब केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अगली चुनौती बाघों के लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त शिकार प्रजातियां और मानव आबादी के साथ संतुलित सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने की है। सरिस्का और पन्ना जैसे उदाहरण इसी दिशा में संरक्षण प्रयासों को आगे बढ़ाने की राह दिखाते हैं।
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