उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी होगी हाईटेक, अब ड्रोन-सैटेलाइट और सेंसर से होगी रियल टाइम मॉनिटरिंग

किसी झील में असामान्य बदलाव समय रहते पकड़ना प्रशासन के लिए संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में कार्रवाई की गुंजाइश बढ़ा सकता है। इसके लिए तकनीकी एजेंसियों और विशेषज्ञ संस्थानों के साथ समन्वय, संवेदनशील क्षेत्रों में चेतावनी तंत्र और पहले से चल रहे पायलट प्रयास अहम होंगे। लेकिन यह निगरानी व्यवस्था जमीन पर चेतावनी और प्रतिक्रिया तक कितनी तेजी से पहुंचेगी, यही इसकी असली परीक्षा होगी।
Drone and sensor equipment monitoring a glacial lake in the high Himalayas of Uttarakhand

देहरादून, 31 अगस्त। उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरे को देखते हुए उनकी निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी है। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने ग्लेशियर झीलों के जलस्तर, आकार और जलभराव में होने वाले बदलावों पर लगातार और रियल टाइम नजर रखने के निर्देश दिए हैं।

मदन कौशिक ने 30 अगस्त को राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र में ग्लेशियर झीलों और मौजूदा आपदा स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड भौगोलिक रूप से संवेदनशील राज्य है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों में होने वाले बदलावों की वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है।

ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन और सेंसर आधारित तकनीकों के इस्तेमाल की संभावनाओं का अध्ययन करने को कहा गया है। जरूरत के अनुसार इन तकनीकों को निगरानी व्यवस्था में शामिल किया जाएगा, ताकि झीलों में होने वाले असामान्य बदलावों की जानकारी समय रहते मिल सके।

संवेदनशील क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुसार अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश भी दिए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी ग्लेशियर झील में असामान्य बदलाव या संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाना है।

सरकार का जोर केवल ग्लेशियर झीलों की पहचान तक सीमित रहने के बजाय उनके आकार, जलस्तर और दूसरे बदलावों की लगातार निगरानी पर है। इसके लिए आपदा प्रबंधन विभाग के साथ तकनीकी एजेंसियों और विशेषज्ञ संस्थानों के बीच समन्वय मजबूत करने को कहा गया है।

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम पहले से भी चल रहा है। मई 2026 में वसुंधारा झील को पायलट साइट के रूप में चुनकर वहां रियल टाइम मॉनिटरिंग और पूर्व चेतावनी व्यवस्था विकसित करने की योजना सामने आई थी। अब आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए इस व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

समीक्षा बैठक में राज्य में लगातार हो रही बारिश और उससे जुड़े जोखिमों पर भी चर्चा हुई। सभी संबंधित विभागों को 24 घंटे अलर्ट मोड में रहने, नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी करने और संवेदनशील क्षेत्रों में जरूरी मशीनरी तथा संसाधन तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।

डैम या बैराज से पानी छोड़े जाने की स्थिति में निचले क्षेत्रों तक पहले सूचना पहुंचाने को भी कहा गया है। इसके अलावा बारिश या सड़क बाधित होने की स्थिति में यात्रा का संचालन मौसम और मार्ग की स्थिति देखकर करने और जरूरत पड़ने पर यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर रोकने के निर्देश दिए गए हैं।

रियल टाइम निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत होने से ग्लेशियर झीलों में होने वाले असामान्य बदलावों की जानकारी पहले मिलने की संभावना बढ़ेगी। इससे संभावित आपदा की स्थिति में प्रशासन को समय रहते चेतावनी जारी करने और प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी कदम उठाने में मदद मिल सकती है।

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